
असीम राज पांडेय, रतलाम। रतलाम में इन दिनों खाकी का एक चेहरा खूब चमक रहा है। कप्तान साहब ने ऐसी ड्रग्स फैक्ट्री पर हाथ डाला कि नशे के कारोबारियों की नींद उड़ गई और गांव वालों को भी लगा कि सही मायनों में आज़ादी अब उन्हें मिली है। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। क्योंकि हर फैक्ट्री के पीछे एक जनरेटर होता है और हर जनरेटर के पीछे संरक्षण की बिजली। इसी सिस्टम में कुछ ऐसे “आस्तीन के सांप” भी कुंडली मारकर बैठे थे, जो इस फैक्ट्री को खाद-पानी दे रहे थे। उर्दू में एक नाम का अर्थ होता है कृपालु और मेहरबान। दो तारों के यह साहब भी वाकई बहुत मेहरबान निकले। दो तारों वाले साहब, जो पहले भी अपनी कारगुजारियों से सुर्खियां बटोर चुके हैं, अब ड्रग्स फैक्ट्री के पोस्टर बॉय बनते दिख रहे हैं। कारण प्रमुख यह कि इन दो तारों के साहब पर संभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी का वृहदहस्त। हवेलीनुमा आशियाने में चल रही फैक्ट्री से जब वर्दी और आईडी कार्ड बरामद हुए तो संदेह को पुख्ता होने में देर नहीं लगी। ऊपर तक पुरानी बंद फाइलें खुली, नोटिस जारी हुआ और साहब की पेशानी पर चिंता की लकीरें उभर आईं। ये अंदर की बात है… ( This is an inside story!..) कि ड्रग्स फैक्ट्री चलाने के साथ-साथ जमीनों की खरीद-फरोख्त और कब्जे का खेल भी पूरे शबाब पर था। गांव वाले आज भले ही खुशी से चिल्ला रहे हैं“आज हमें आज़ादी मिली है।”लेकिन असली आज़ादी तब मिलेगी, जब खाकी, कलमकार और सफेदपोश तीनों के नाम खुलकर सामने आएंगे और सख्त कार्रवाई होगी।
उपयंत्री की जादूगरी और कमिश्नर का नाम
नगर निगम में कुछ उपयंत्री ऐसे भी हैं जिन्हें लगता है कि साहब का नाम जेब में रखो और जहां चाहो इस्तेमाल करो। पटरी पार क्षेत्र का ताजा मामला सुनिए। छोटे कद-काठी और ठिसियाकर चलने वाले उपयंत्री साहब एक निर्माण स्थल पर पहुंचे। भूमि स्वामी के पास वैध अनुमति थी, फिर भी साहब ने कमिश्नर का नाम लेकर काम रुकवा दिया “शिकायत आई है, सामान भी बंटोर लेंगे।” मजेदार बात यह रही कि भूमि स्वामी खुद फूलछाप पार्टी के सक्रिय कार्यकर्ता निकले। सीधे कमिश्नर साहब से बात हुई तो जवाब साफ था “हमने कोई आदेश नहीं दिया।” ये अंदर की बात है… ( This is an inside story!..) कि उपयंत्री साहब मोटी जेब गर्म करने के लिए किसी के भी सामने कमिश्नर का नाम लेने से नहीं चूकते। अब देखना यह है कि कमिश्नर साहब अपने नाम की इस जादूगरी पर क्या कार्रवाई करते हैं या फिर यह जादू रतलाम में यूं ही चलता रहेगा।
बेलगाम अफसरशाही से नेताजी हुए रूबरू
पिछले दिनों जिला मुख्यालय पर एक वृहद बैठक हुई। अध्यक्षता संसदीय माननीय कर रहे थे और एजेंडा था अफसरों के काम का मूल्यांकन। माहौल कुछ ऐसा था जैसे जनता रोज़ जिन अफसरों के चक्कर काटती है, उसी का लाइव डेमो चल रहा हो। रतलाम का सबसे बड़ा रेफरल सेंटर (मेडिकल कॉलेज) हो या आधा दर्जन अहम विभाग। कई साहिबान और साहब बैठक से ऐसे गायब रहे जैसे छुट्टी का मैसेज व्हाट्सएप पर डाल दिया हो। कुछ ने तो नेताजी की तरह प्रतिनिधि भेजकर फाइलें थमा दीं “आप देख लीजिएगा।” इंदौर में दूषित पानी से मौतों के बाद जिस तरह अफसरों पर ठीकरा फोड़ा गया, वैसा ही नज़ारा यहां भी दिखा। बैठक से दूरी बनाकर अफसरों ने साफ संदेश दे दिया “हम न जनता से डरते हैं, न नेताजी से।” ये अंदर की बात है… ( This is an inside story!..) कि नेताजी अब समझ चुके हैं कि जिले का सिस्टम कुंभकर्णी नींद में है। नेताओं के मन में यह सवाल भी उठा है कि जब अफसर ऐसे हैं, तो जनता का हाल कैसा होगा?
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