
असीम राज पांडेय, रतलाम। जिले में अरसे से बेखौफ चल रही ड्रग्स फैक्ट्री पर जब खाकी ने सख्ती दिखाई, तो यह कार्रवाई कुछ जिम्मेदारों को हजम नहीं हुई। अनुशासन और सख्ती के लिए पहचाने जाने वाले खाकी महकमे में इसी मुद्दे पर राजनीति गरमाई थी। पिछले दिनों खाकी विभाग से ही एक अफवाह हवा में उछाली गई कि ड्रग्स फैक्ट्री पर छापे के दौरान टीम ने भारी नकदी गायब कर ली। अफवाह उड़ाने वाले जिम्मेदार यह भूल गए कि कार्रवाई के वक्त टीम को शातिर तस्करों से अपना गला तक दबवाने की नौबत आ गई थी और जान बचाने के लिए जद्दोजहद करनी पड़ी थी। हवेलीनुमा आलीशान परिसर में चल रही ड्रग्स फैक्ट्री का कप्तान और टीम ने भंडाफोड़ किया, तो वहां से मिली एक खाकी के तस्कर की वर्दी और आईडी कार्ड की वजह से पूरे मामले में हवा दूसरी दिशा में मोड़ने की कोशिशें हुई। हालात ऐसे बना दिए गए मानो शातिर तस्कर युवा पीढ़ी को तबाह नहीं कर रहा था, बल्कि भैंस से दूध निकालने का मासूम-सा धंधा कर रहा हो। खाकी महकमे की अंदरूनी गुटबाजी और एक अफसर के इशारों पर हो रही इस राजनीति से साफ था कि जांच की आंच से बचने के लिए और मामले को दबाकर कहानी में नया मोड़ देने का शातिर खेल शुरू किया। ये अंदर की बात है… (This is inside information) कि जो खाकी की सख्त कार्रवाई को बदनाम करने में जुटा था, वह भोपाल बुलाकर सम्मानित हुआ, लेकिन वह खुशी मना पाता उसके पहले ऐसी जगह तबादला आदेश टाइप हुआ, जिसके बारे में बॉडी बनाने वाले साहब ने सोचा भी नहीं था।
निगम के साहब को कमीशन का नशा ऐसा
आमजन को मूलभूत सुविधाएं देने वाला विभाग इन दिनों जनता की समस्याएं सुनने के बजाय लुका-छिपी के खेल में मशगूल है। मामला कुछ यूं है कि रतलाम के राजा ने जनता के मनोरंजन के लिए अपने नाम से एक व्यक्ति को जमीन आवंटित की थी। लीज पर दी गई इस जमीन पर दिखावे के लिए तो फिल्म के नाम पर टॉकीज है, लेकिन हकीकत में वहां सस्ते स्वेटर की सेल, होर्डिंग और बैनरों का नियम विपरीत कारोबार बेखौफ फल-फूल रहा है। एक रतलामी ने जब लिखित शिकायत स्थानीय प्रशासन को दी, तो फाइल ने दफ्तर की धूल से दोस्ती कर ली। हार न मानते हुए जब मामला सीएम हेल्पलाइन पहुंचा, तो नगर निगम के इन महाशय अफसर की जादूगरी देखने लायक रही। पांच बार शिकायत एल/4 में पहुंचने के बाद भी उसे एल/3 में लौटा दिया गया, ताकि अवैध कारोबार की गाड़ी बिना ब्रेक दौड़ती रहे। जावरा में किसानों से अभद्रता हो, कलेक्ट्रेट की जनसुनवाई में वृद्धा को धक्के मारने का मामला हो या फिर शहर के माननीय पर सत्ताधारी नेताओं के सामने टिप्पणी। ये साहब हमेशा सुर्खियों में रहने का हुनर जानते हैं। ये अंदर की बात है… (This is inside information) कि इन निगम अफसर को अपनी कुर्सी पर वही गुमान है, जो कभी राजीव गांधी सिविक सेंटर में नपे एक पूर्व अफसर को था। राजा के नाम पर दी गई जमीन पर काले कारोबार से मिलने वाला कमीशन साहब को नशे में रखे हुए है।
नई मैडम को लगती है झांकी फिजूल खर्ची
राष्ट्रीय पर्व गणतंत्र दिवस पर परंपरा के मुताबिक इस बार भी झांकियां निकाली गईं, लेकिन जिम्मेदारों की अरुचि के कारण वे फीकी-फीकी नजर आईं। पंचायतों की कमान संभालने वाली प्रमुख महिला अफसर के सामने जब कर्मचारियों ने झांकी तैयारियों के खर्च की फाइल रखी, तो मैडम का जवाब दो टूक था “यह फिजूल खर्ची हमेशा क्यों होती है?” गणतंत्र दिवस बीतने के बाद भी मैडम का यह बयान महकमे में चर्चा का विषय बना हुआ है। पंचायत स्तर पर भ्रष्टाचार रोकने में नाकाम साबित हुईं नई-नवेली पंचायतों की मुखिया भले ही बड़े ओहदे पर बैठ गई हों, लेकिन अपनी दिनचर्या, सरकारी वाहन और सुविधाओं पर होने वाले खर्च में कटौती उन्हें फिजूल नहीं लगती। बच्चों, ग्रामीणों और जनता के लिए राष्ट्रीय पर्व पर निकलने वाली झांकियां उन्हें गैरज़रूरी दिखती हैं। ये अंदर की बात है…(This is inside information) कि पंचायतों की कमान संभालने वाली मैडम अब तक आमजन के लिए कोई खास उपलब्धि तो नहीं दे पाईं, लेकिन राष्ट्रीय पर्व की परंपराएं जरूर उन्हें फिजूल खर्च लगती हैं। जनता का सीधा सवाल है अगर झांकी फिजूल खर्च है, तो पहले शासन की सुविधाओं का त्याग करिए, फिर आपकी बात शायद गले उतरे।
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