असीम राज पाण्डेय, रतलाम। जिले के स्वास्थ्य विभाग में अब बुखार, डेंगू, मलेरिया की नहीं, “लव-जिहाद के पोलियो” की महामारी फैली हुई है। ये ऐसा पोलियो है जो शरीर नहीं, व्यवस्था को अपंग कर चुका है। ऊंकाला क्लिनिक में जो “मुंह काला कांड” हुआ, उसने विभाग की ऐसी धुलाई कर दी कि अब हर चेहरा संदेह में नजर आ रहा है। कंप्यूटर ऑपरेटर जिन्हें लोग अब तक “Ctrl+C Ctrl+V” वाला समझते थे, असल में “ऑपरेशन लव-जिहाद” के डेटा डायरेक्टर निकले। कोई शूटिंग करता है, कोई शर्टिंग, और कुछ तो खुद को DM का डुप्लिकेट मान बैठते हैं। कंप्यूटर कम चलाते हैं, बाहुबली की तरह “डेटा एंट्री” के नाम पर महिला कर्मचारियों का ‘हार्डडिस्क’ स्कैन करते फिरते हैं। ब्लैकमेलिंग, धमकी, वीडियो— हर हथियार इनकी जेब में हैं। मोबाइल इनके लिए सिर्फ कॉल करने का यंत्र नहीं, बल्कि “ब्लैकमेलिंग बम” है। संविदा पर आई बहनों को ये ऐसे चंगुल में फंसाते हैं जैसे कबूतर बाजरे पर। अफसर साहब भी ऐसे हालात में “मौज-मस्ती मिशन” में शामिल होकर आंखों पर पट्टी बांधे बैठे हैं। ये अंदर की बात है… कि लव-जिहाद का ‘सुपर स्प्रेडर’ हाल ही में विभाग से खदेड़ा गया है, लेकिन उसके पीछे छूटे “प्रेमी वायरस” अब भी सिस्टम में एक्टिव हैं और आउटसोर्स कर्मियों की अस्मिता को स्कैन, डिलीट और डाउनलोड करने में जुटे हैं।
नेहरू स्टेडियम ओलंपिक्स का नया आश्वासन
शहर का इकलौता स्टेडियम अब खिलाड़ी नहीं, “खाली वादों की बुलेट सर्विस” बन गया है। नेताओं ने इस मैदान को इतना ‘आश्वासन-पोषित’ कर दिया है कि घास की जगह अब वादों की गाजर उग रही है। मुख्यमंत्री जी ने बड़े जज्बात से स्टेडियम के लिए ₹5 करोड़ का एलान किया था, तब लगा था कि यहां एशियाड नहीं तो कम से कम पंचायत लीग तो होगी। मगर अब मैदान “ब्रेकिंग न्यूज़ का मंच” बन चुका है, जहां खिलाड़ी की जगह नेता पसीना बहा रहे हैं। ये अंदर की बात है… कि जिन अधिकारियों को यहां ‘खेल’ करवाना था, वो खुद स्टेडियम को “गोल पोस्ट” समझ बैठें हैं। जहां हर शिकायत को लात मारकर गोल कर दिया जाता है। निगम प्रभारी और जिले के बड़े बाबू जनसुनवाई में जिस तरह “हम देख रहे हैं” की रिकॉर्डिंग सुनाते हैं, वही राग अब पार्टी के नेताओं को भी सुना रहे हैं। फूलछाप पार्टी के तेवर देखकर लग रहा कि अगर जल्द मैदान सुधरा नहीं, तो नेतागण ‘राजनीतिक थ्रो’ में इतने दक्ष हैं कि बड़े बाबू और प्रभारी को मानसून में भी गर्म हवाओं का स्वाद चखा देंगे।
थानेदारों का कमाऊ पूतों से नहीं मोहभंग
डीजीपी साहब ने ट्रांसफर लिस्ट जारी की, मानो बिजली नहीं, ‘करंट अफेयर’ की कॉपी फट गई हो। आदेश था “ट्रांसफर मतलब ट्रांसफर!” लेकिन जिले के कुछ टीआई साहब ने इस फरमान को “रद्दी कागज़” मान लिया। इन थानों में कुछ प्रभारी ऐसे विराजे हैं जैसे मंदिर में पुराने पुजारी। जिन्हें हटाने की बात करना भी पाप समझा जाता है। त्योहार, वीआईपी दौरे, बाढ़ हर बहाने से ट्रांसफर टालने का पीएचडी कर रखा है इन्होंने। जिनका थानों में टीआई से लगाव नहीं था वह ट्रांसफर आदेश लेकर चल दिए। लेकिन जिनके टीआई मोह में डूबे हैं, वह अब भी कुर्सी से ऐसे चिपके हैं जैसे पुराने टीवी में एंटीना की वायर। कप्तान साहब के आदेश अब “फाइलों में दफन” होकर रह गए हैं। ये अंदर की बात है… कि अब सवाल उठ रहे हैं “क्या अब पुलिस थानों में भी ‘पोलिंग बूथ’ जैसा तंत्र लागू हो गया है, जहां जिसको जम जाना है, वो सालों तक जमेगा और जो ईमानदार है, वो ठेले की तरह खींचा जाएगा?”