
असीम राज पांडेय, रतलाम। शासन को खुश करने का सबसे आसान तरीका क्या है? काम करना नहीं, बल्कि काम करते हुए फोटो खिंचवाना। रतलाम जिला प्रशासन के अफसर इस कला में खासे निपुण दिखाई दे रहे हैं। मामला कुछ ऐसा है कि हाल ही में प्रदेश के मुखिया ने जैविक खेती को बढ़ावा देने की घोषणा की। घोषणा होते ही जिले के अफसरों में ऐसी फुर्ती आई कि आनन-फानन में सब्जी मंडी में जैविक हाट शुरू करवा दिया। हाट शुरू हुआ, कैमरे चमके, रील बनी, प्रेस रिलीज जारी हुई और सोशल मीडिया पर वाहवाही भी बटोर ली गई। अब जरा हकीकत भी देख लीजिए। यह वही मंडी है जहां किसानों को पीने का साफ पानी तक मुनासिब नहीं होता और साफ-सुथरे शौचालय की सुविधा भी सपना ही है। मंडी में किसान अपनी उपज बेचने आते हैं, लेकिन यहां सुविधाओं से ज्यादा कांटे और परेशानियां उनका स्वागत करती हैं। मंडी के मुनिमों (सचिवों) की मनमानी भी कम नहीं। किसान अपनी समस्या लेकर जाए तो जवाब मिलता है—“अगर यहां ज्यादा दिक्कत है तो मत आया करो।” ये अंदर की बात है… (This is an inside story!..) कि कृषि और सब्जी मंडी के जिम्मेदारों का ध्यान किसानों की सुविधा से ज्यादा निर्माण कार्यों के बजट पर रहता है। वजह साफ है, निर्माण में जितना बड़ा बजट, उतना बेहतर उनका पर्सनल कमीशन सिस्टम (पीसीसी)। ऐसे में किसान चाहे परेशान हों, लेकिन फोटो में मंडी हमेशा चमकती रहती है।
थानों में ‘देशभक्ति’ दीवारों पर, ‘सेवा’ दलालों के भरोसे
शहर सहित अंचल के कई थानों में इन दिनों एक नई व्यवस्था चल रही है। थाने के बाहर दीवारों पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा रहता है “देशभक्ति और जनसेवा”, लेकिन अंदर प्रवेश करते ही पता चल जाता है कि यहां जनसेवा किसके भरोसे चल रही है। थाना परिसर हो या साहब का चैंबर, हर जगह आपको 24 घंटे सक्रिय रहने वाले दलाल मिल जाएंगे। फरियादी की पहली मुलाकात पहले संतरी से हुआ करती थी, लेकिन अब यह जिम्मेदारी भी कई जगह दलालों ने संभाल ली है। कोई पीड़ित व्यक्ति लूट-पाट या मारपीट की शिकायत लेकर थाने पहुंचे तो सबसे पहले दलाल उसे पकड़ लेता है। पूरी कहानी बड़े ध्यान से सुनता है, जैसे कोई अनुभवी जांच अधिकारी हो। इसके बाद वह सीधे दूसरी पार्टी तक पहुंचकर समझौते का गणित बैठाने में लग जाता है। फिर एक नया गणित तैयार होता है, जिसकी सूचना मोबाइल पर साहब तक पहुंच जाती है। साहब जांच शुरू होने का ऐलान कर देते हैं और फरियादी न्याय की उम्मीद में थाने के चक्कर लगाता रहता है। उधर आरोपी पक्ष दलाल के माध्यम से “रसीद” फड़वाकर चैन की नींद सोने लगता है। ये अंदर की बात है… (This is an inside story!..) कि खाकी विभाग में दीवारों पर जितने आदर्श और सिद्धांत लिखे हैं, वे आमजन को पढ़ाने के लिए ही हैं। जमीन पर हालात ऐसे हैं कि आम आदमी बेचैन है और बदमाश आराम से सो रहा है।
होली के रंग में रंगा झगड़ा, मेडिकल कॉलेज में टूटा भविष्य
कहावत है कि घर में चार बर्तन हों तो खनकते जरूर हैं। लेकिन जिले के बड़े रेफरल सेंटर यानी मेडिकल कॉलेज में होली के मौके पर चार बर्तन ऐसे टकराए कि खनकने की बजाय टूट-फूट ही गए। बताया जाता है कि रणकुंवरों के गांव से आए एक क्लास का सबसे बदमाश छात्र ने अपने साथियों पर दबंगई दिखाने की कोशिश कर दी। रंगों के इस महापर्व पर जहां लोग गिले-शिकवे भूलकर एक-दूसरे को गले लगाते हैं, वहीं यहां मामला लड़ाई से आगे बढ़कर धर्म के रंग में रंगने की कोशिश तक पहुंच गया। खाकी ने शुरुआत में एक वर्ग विशेष के चार मेडिकल छात्रों को आरोपी बना दिया। लेकिन जैसे ही दूसरे पक्ष के छात्र को लेकर आवाज उठने लगी, कुछ ही देर में उसे गैर इरादतन हत्या का तमगा पहना दिया गया। डॉक्टर का नाम भगवान के बाद लिया जाता है, लेकिन हमारे इस रेफरल सेंटर में भविष्य के वही डॉक्टर अभी से सुर्खियों में हैं। यहां पढ़ने वाले ये होनहार बच्चे आगे चलकर सफेद कोट पहनकर समाज की सेवा करने वाले थे। लेकिन सवाल यह है कि इनका मार्गदर्शन करने वाले जिम्मेदार कहां हैं? ये अंदर की बात है… (This is an inside story!..) कि कुछ जिम्मेदारों का ध्यान बच्चों के भविष्य से ज्यादा इस बात पर रहता है कि नौकरी के साथ-साथ प्राइवेट प्रैक्टिस, ऑपरेशन और निजी अस्पतालों की विजिट से कितना अतिरिक्त पैकेज मिल सकता है। इसके कारण रेफरल सेंटर विवादों से तो सुर्खियां बंटोरेगा ही सही।
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