
असीम राज पांडेय, रतलाम। राजनीति में इन दिनों एक नेताजी दो मामलों में दर्ज कानूनी कार्रवाई से बाद खासे नरम हैं। यह नेताजी आए दिन सड़क घेर लेते हैं और कैमरे भी। फर्क बस इतना है कि सड़क दो दिन में खुल जाती है, लेकिन कैमरों की फ्लैश का असर नेताजी की छवि पर लंबे समय तक चमकता रहता है। हाल ही में नेताजी ने खनन मामले में सीटिंग एमएलए साहब के चचेरे भाई की खदान सील करवाकर ऐसा पंचनामा बनवाया कि लगा जैसे राजनीति का नया अध्याय शुरू हो गया हो। जिला मुख्यालय के बायपास पर दो दिन तक चक्काजाम रहा। नारों की आवाज ऐसी गूंजी मानो शासन-प्रशासन की नींद उड़ गई हो। चौराहों पर चाय की दुकानों से लेकर पान ठेलों तक चर्चा यही“ कि कुछ दिन पहले पिपलौदा में सड़क पर प्रदर्शन करने के मामले में इन्हीं नेताजी पर एफआईआर दर्ज हो गई थी। एक समाज के विरोध के बाद तो एट्रोसिटी सहित कई धाराएं भी लग गईं। यानी पिपलौदा और माननखेड़ा में प्रदर्शन महंगा पड़ गया। अब सवाल यह उठ रहा है कि जब रतलाम बायपास पर दो दिन तक चक्काजाम रहा, नारेबाजी हुई, प्रशासन को खूब खरी-खोटी सुनाई गई तो यहां मामला दर्ज क्यों नहीं हुआ? ये अंदर की बात है… (This is an inside story!) कि शहर की राजनीतिक गलियों में इस सवाल के कई जवाब घूम रहे हैं। एक कहानी यह भी है कि अफसरों की मनुहार के बाद आंदोलन शांत हुआ, इसलिए नेताजी को मामले में थोड़ी राहत दी गई। दूसरी कहानी और भी दिलचस्प है। कहा जा रहा है कि आंदोलन भले ही 11 बिंदुओं की मांग के साथ मंच पर सजाया गया हो, लेकिन असली फिल्म का हीरो तो वही खनन वाला पंचनामा था, जो सीटिंग एमएलए साहब के रिश्तेदार की खदान पर लिखा गया था। फिलहाल इतना जरूर है कि नेताजी के आंदोलन, कैमरे और पंचनामे तीनों बराबर भूमिका निभा रहे हैं। बस फर्क इतना है कि सड़क पर भीड़ धीमे-धीमे कम पड़ जाती है।

फोटो में जैविक हाट, जमीन पर बदहाल मंडी
शासन को खुश करने का सबसे आसान तरीका क्या है? काम करना नहीं, बल्कि काम करते हुए फोटो खिंचवाना। रतलाम जिला प्रशासन के अफसर इस कला में खासे निपुण दिखाई दे रहे हैं। मामला कुछ ऐसा है कि पिछले दिनों प्रदेश के मुखिया ने जैविक खेती को बढ़ावा देने की घोषणा की। घोषणा होते ही जिले के अफसरों में ऐसी फुर्ती आई कि आनन-फानन में सब्जी मंडी में जैविक हाट शुरू करवा दिया। हाट शुरू हुआ, कैमरे चमके, रील बनी, प्रेस रिलीज जारी हुई और सोशल मीडिया पर वाहवाही भी बटोर ली गई। अब जरा हकीकत भी देख लीजिए। यह वही मंडी है जहां किसानों को पीने का साफ पानी तक मुनासिब नहीं होता और साफ-सुथरे शौचालय की सुविधा भी सपना ही है। मंडी में किसान अपनी उपज बेचने आते हैं, लेकिन यहां सुविधाओं से ज्यादा कांटे और परेशानियां उनका स्वागत करती हैं। मंडी के मुनिमों (सचिवों) की मनमानी भी कम नहीं। किसान अपनी समस्या लेकर जाए तो जवाब मिलता है—”अगर यहां ज्यादा दिक्कत है तो मत आया करो।” ये अंदर की बात है… (This is an inside story!) कि कृषि और सब्जी मंडी के जिम्मेदारों का ध्यान किसानों की सुविधा से ज्यादा निर्माण कार्यों के बजट पर रहता है। वजह साफ है, निर्माण में जितना बड़ा बजट, उतना बेहतर उनका पर्सनल कमीशन सिस्टम (पीसीसी)। ऐसे में किसान चाहे परेशान हों, लेकिन फोटो में मंडी हमेशा चमकती रहती है।
थानों में ‘देशभक्ति’ दीवारों पर, ‘सेवा’ दलालों के भरोसे
शहर सहित अंचल के कई थानों में इन दिनों एक नई व्यवस्था चल रही है। थाने के बाहर दीवारों पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा रहता है “देशभक्ति और जनसेवा”, लेकिन अंदर प्रवेश करते ही पता चल जाता है कि यहां जनसेवा किसके भरोसे चल रही है। थाना परिसर हो या साहब का चैंबर, हर जगह आपको 24 घंटे सक्रिय रहने वाले दलाल मिल जाएंगे। फरियादी की मुलाकात पहले संतरी से हुआ करती थी, लेकिन अब यह जिम्मेदारी भी कई जगह दलालों ने संभाल ली है। कोई पीड़ित व्यक्ति लूट-पाट या मारपीट की शिकायत लेकर थाने पहुंचे तो सबसे पहले दलाल उसे पकड़ लेता है। पूरी कहानी बड़े ध्यान से सुनता है, जैसे कोई अनुभवी जांच अधिकारी हो। इसके बाद वह सीधे दूसरी पार्टी तक पहुंचकर समझौते का गणित बैठाने में लग जाता है। फिर एक नया गणित तैयार होता है, जिसकी सूचना मोबाइल पर साहब तक पहुंच जाती है। साहब जांच शुरू होने का ऐलान कर देते हैं और फरियादी न्याय की उम्मीद में थाने के चक्कर लगाता रहता है। उधर आरोपी पक्ष दलाल के माध्यम से “रसीद” फड़वाकर चैन की नींद सोने लगता है। ये अंदर की बात है… (This is an inside story!)कि खाकी विभाग में दीवारों पर जितने आदर्श और सिद्धांत लिखे हैं, वे आमजन को पढ़ाने के लिए ही हैं। जमीन पर हालात ऐसे हैं कि आम आदमी बेचैन है और बदमाश आराम से सो रहा है।
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