
असीम राज पांडेय, रतलाम। रतलाम की खाकी इन दिनों अपराध रोकने से ज़्यादा रील बनाने में ज्यादा मशगूल है। शहर और अंचलों में वारदातें बेलगाम हैं, मगर खाकी को सोशल मीडिया पर वायरल होने का ऐसा चस्का चढ़ा है कि वर्दी अब “लाइक और व्यूज” की गिरफ्त में नजर आ रही है। मकर संक्रांति पर चायनीज मांजे की रोकथाम के नाम पर शहर के तीन तारों के साहब और एक थाने के मुखिया दुकान में मांजा तोड़ते-मरोड़ते दिखे। उद्देश्य कम, अभिनय ज़्यादा था। रील बनाने वाले भी खाकी को खुश रखने की होड़ में अब मुखबरी का काम शुरू कर दिया है। हाल ही में पटरी पार क्षेत्र के एक मकान में देह व्यापार की सूचना देने का श्रेय भी एक रीलमेकर ने लिया। तीन तारों के साहब के इशारे पर वह अड्डे तक जा पहुंचा और खबर “पुख्ता” कर दी। रीलमेकर के कारनामे से प्रसन्न होकर तीन तारों के साहब ने मीडिया को दरकिनार भी किया। ये अंदर की बात है… (This is an inside story!..) कि रीलमेकर के प्रति साहब का यह मोह जब वरिष्ठ अधिकारियों तक पहुंचा, तो खाकी महकमे से काफी कुछ सुनने को भी मिला। अब जनता पूछ रही है—रील बनाने वाली खाकी को कब फुर्सत मिलेगी ?
नेताजी ने प्रदर्शन में निभाया डबल रोल
दो दिन पहले रतलाम की एक होटल के बाहर की बाउंड्रीवॉल तोड़े जाने का मामला सियासी तापमान बढ़ गया। फूलछाप पार्टी और हिंदू संगठनों ने एकजुट होकर सैलाना रोड पर जमकर प्रदर्शन किया। रतलाम निगम के प्रशासनिक मुखिया के खिलाफ नारे लगे, तेवर तीखे हुए और कैमरे चालू रहे। गरमागरमी के बीच फूलछाप पार्टी के नेता और पार्षदों ने निगम मुखिया को सड़क पर ही शहर की “फिजां खराब करने” की चेतावनी तक दे डाली। वीडियो वायरल हुआ, तेवर सुर्खियां बने। लेकिन तभी कहानी ने करवट ली। नेताजी प्रशासनिक मुखिया को प्रदर्शन स्थल के पास एक दुकान के भीतर ले गए। दरवाज़ा बंद हुआ, कैमरे बाहर रह गए और करीब आधे घंटे तक मंत्रणा चली। जब दोनों पक्ष बाहर निकले, तो चेहरों पर तैरती मुस्कान ने प्रदर्शनकारियों के मन में कई सवाल खड़े कर दिए। सड़क पर गुस्सा और बंद कमरे में समझौता, साफ था कि कुछ ऐसा हुआ जो सार्वजनिक नहीं हो सकता था। ये अंदर की बात है… (This is an inside story!..) कि सड़क पर 4-5 घंटे पसीना बहाने वालों को भले ही तसल्ली न मिली हो, मगर रोटियां तो नेताजी ने ही सेंक कर बखूबी डबल रोल निभाया हैं।
रतलाम कप्तान देने लगे रवानगी के संकेत
जिले की सुरक्षा की कमान संभाल रहे कप्तान साहब अब अपनी रवानगी के संकेत खुलेआम देने लगे हैं। महकमे के भीतर से जो बातें बाहर आ रही हैं, वह कुछ यूं हैं – कप्तान दस्तावेजों में मजबूती और औचक निरीक्षणों में सख्ती के लिए जाने जाते हैं। बीते दिनों अलग-अलग थानों के निरीक्षण के दौरान उन्होंने खाकीधारियों को साफ शब्दों में नसीहत दी- “फरवरी तक मेरे सामने कोई गड़बड़ी मत करना, नहीं तो सजा तय है।” इस एक लाइन ने बहुत कुछ कह दिया। माना जा रहा है कि कप्तान को ट्रांसफर सूची की भनक लग चुकी है और उनका नाम उसमें शामिल है। इसलिए जाते-जाते वह अधीनस्थों को आगाह कर रहे हैं कि मेरे रहते ऐसा कुछ मत करना जिससे जांच और कार्रवाई दोनों झेलनी पड़े। ये अंदर की बात है… (This is an inside story!..) कि कप्तान की रतलाम पोस्टिंग उस वक्त हुई थी, जब जिले में कानून-व्यवस्था के हालात बिगड़े हुए थे और तत्कालीन कप्तान सहित टीआई साहब पर गाज गिरी थी। मौजूदा कप्तान ने हालात संभाले लेकिन अधीनस्थों की मनमानी पर अंकुश नहीं लगा। अब देखना यह है कि अगला कप्तान रतलाम की खाकी को रील से निकालकर रियल ड्यूटी पर कैसे लाता है।
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