
असीम राज पांडेय, रतलाम। नगर निगम के गलियारों में इन दिनों बिजली से ज्यादा करंट एक ऊर्जामंत्री दे रहे हैं। आमजन की सेवा का जज्बा लेकर फुलछाप पार्टी के टिकट पर जीतकर आए नेताजी ने कुर्सी संभाली तो लगा कि अब शहर रोशन होगा। पर रोशनी शहर में कम और उनके आयोजनों में ज्यादा फैलने लगी। कहानी की शुरुआत होती है “जनसेवा” के नाम पर आयोजित एक भव्य टूर्नामेंट से। टूर्नामेंट ऐसा कि मानो ओलंपिक का देसी संस्करण हो। मैदान निगम का, पानी निगम का, लाइट निगम की और नाम नेताजी का। चंदा वसूली में भी ऊर्जा ऐसी कि बिजली विभाग भी शर्मा जाए। जनता सोचती रही वाह क्या जनप्रतिनिधि मिला है। खुद खर्च नहीं करता, निगम से करवाता है, ताकि जनता पर बोझ न पड़े! लैपटॉप कांड की गूंज अभी ठंडी भी नहीं हुई थी कि नेताजी ने एक और “सामाजिक समरसता” का प्रयोग कर डाला। इस बार एक टेलीकॉम शॉप द्वारा आयोजित क्रिकेट स्पर्धा में अपने संबंधों की बैटिंग करने पहुंच गए। सोचा जब अपना टूर्नामेंट फ्री की बिजली से जगमगा सकता है, तो मित्रों का मैच क्यों अंधेरे में रहे? आदेश हुआ बिजली फ्री, बंदोबस्त फ्री, सेवा फुल। लेकिन कहते हैं न, हर तार सीधे ट्रांसफॉर्मर से नहीं जुड़ता। मामला निगम के बड़े साहब तक पहुंच गया। साहब पुराने खिलाड़ी निकले। उन्होंने रात के मैच में ऐसा स्विच दबाया कि पूरा मैदान अंधेरे में डूब गया। उधर नेताजी का पारा हाई वोल्टेज हो गया। नेताजी ने साहब को मोबाइल घनघनया। ये अंदर की बात है… (This is an inside story!..) कि साहब ने फोन उठाया और बड़े इत्मीनान से समझाया“मंत्री जी, मैं निगम चलाता हूं, लंगर नहीं। सबको खैरात नहीं बांट सकता।” बस, यही वो क्षण था जब “ऊर्जामंत्री” का असली फ्यूज उड़ गया। साहब ने साफ शब्दों में उन्हें “भिखारी श्रेणी” का उपभोक्ता घोषित कर दिया। एमआईसी की बैठक में नेताजी ने खूब वोल्टेज दिखाया। पर अफसोस, नेताजी आज तक भिखारी की श्रेणी के उपभोक्ता से बाहर नहीं आ सके।
एक चीख ने फीकी की खाकी की आईएसओ चमक
रतलाम की खाकी ने हाल ही में आधा दर्जन से अधिक आईएसओ प्रमाण-पत्र पाकर सीना चौड़ा किया था। कप्तान से लेकर पांच थानों तक खुशियों की बधाइयां चल ही रही थीं कि एक दर्दनाक घटना ने इस चमक पर कालिख पोत दी। जावरा औद्योगिक क्षेत्र के एक गांव में मजदूर ने पानी की टंकी पर चढ़कर जीवन समाप्त कर लिया। जाने से पहले उसने सीढ़ियों और स्लैब पर लिख दिया “पुलिस नहीं सुनती।” यह वाक्य आईएसओ के चमचमाते फ्रेम से कहीं ज्यादा चमकदार साबित हुआ। गंभीर आरोपों के साथ युवक कप्तान कार्यालय तक गुहार लगा चुका था, मगर सुनवाई नहीं हुई। घटना के बाद प्रदर्शन हुआ तो नींद खुली। कार्रवाई के नाम पर एक एएसआई को लाइन हाजिर कर दिया गया, जैसे पूरी व्यवस्था उसी एक कुर्सी पर टिकी हो। थानों के बाहर बड़े-बड़े अक्षरों में “देशभक्ति” और “जनसेवा” लिखा है। अंदर की कहानी यह है कि आम आदमी की फरियाद अक्सर फाइलों के नीचे दब जाती है। जब पीड़ित न्याय मांगते-मांगते टूट जाता है, तो कभी-कभी उसे ही आरोपी बना दिया जाता है। ये अंदर की बात है… (This is an inside story!..) कि आईएसओ की स्याही अभी सूखी भी नहीं थी कि “पुलिस नहीं सुनती” का वाक्य जनता की जुबान पर चढ़ गया। प्रमाण-पत्र दीवार पर टंगा है, लेकिन खाकी ने जनता का भरोसा खो दिया।
नसबंदी के नाम काटी सरकारी खजाने की नस
रतलाम नगर निगम का कमाल देखिए। शहर की सड़कों पर घूमते कुत्ते तो पकड़ में नहीं आए, लेकिन बजट ज़रूर काबू में कर लिया गया। सवा दो करोड़ से अधिक की रकम ऐसी नसबंद हुई कि सीधे जिम्मेदारों की तिजोरियों में जा बसी। राजीव गांधी सिविक सेंटर में शासकीय जमीन बेचने का अध्याय अभी ठंडा भी नहीं पड़ा था कि कुत्तों की नसबंदी का “महाअध्याय” खुल गया। भारतीय पशु कल्याण बोर्ड ने एबीसी सेंटर को पहले ही रिजेक्ट कर दिया था और बाकायदा रिजेक्शन लेटर भी भेजा था। मगर फाइलों के जादूगरों ने ऐसा करिश्मा दिखाया कि लेटर सहित नियमावली के दस्तावेज ही गायब हो गए। कहते हैं, कुत्तों की नसबंदी से संख्या नियंत्रित होती है, लेकिन यहां तो जो कागज़ घोटाले में अड़चन डाल सकते थे, वे प्राकृतिक रूप से विलुप्त हो गए। उपयंत्री से नोडल अधिकारी बने महाशय ने ऐसा जादुई हाथ चलाया कि पूरा खेल सेट हो गया। तत्कालीन कमिश्नरों का वृहदहस्त और नोडल अधिकारी की “जादूगरी-विद्या” ने मिलकर नसबंदी को महाघोटाले में बदल दिया। ये अंदर की बात है…(This is an inside story!..) कि अब जांच की सुई घूम रही है तो सभी का दिन का चैन और रात की नींद उड़ चुकी है। कुत्तों की नसबंदी से ज्यादा असर अफसरों की नींद पर पड़ा है।
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