
असीम राज पांडेय, रतलाम। जिले की जावरा विधानसभा इन दिनों सियासी वर्चस्व की रिहर्सल का मैदान बनी हुई है। वर्चस्व का झंडा ऊंचा दिखाने की होड़ में एक पक्ष ने समर्थकों की चंद फौज के साथ महू-नीमच हाईवे को दो दिन तक जाम कर दिया। शासन-प्रशासन के खिलाफ चेतावनी, विरोध और भड़ास का पूरा पैकेज परोसा गया। आंदोलन कारियों की जिद थी कि जिले की मुखिया खुद आकर बात करें, लेकिन मुखिया भी कम नहीं निकलीं, उन्होंने भी दो दिन तक उधर झांकना जरूरी नहीं समझा। जैसे-जैसे भीड़ का जोश ठंडा पड़ने लगा, वैसे-वैसे आंदोलन का तापमान भी गिरने लगा। ये अंदर की बात है… (This is an inside story!..) कि आंदोलन शुरू होने से पहले देर रात सर्किट हाउस में सुलह वार्ता का दौर चला। वार्ता इतनी सफल रही कि आंदोलन का सूत्रधार बने सड़क निर्माण ठेकेदार को ब्लैकलिस्टिंग सहित किसी भी तरह की अन्य कार्रवाई नहीं होने का शत-प्रतिशत भरोसा दिया गया। अब यही भरोसा जनता और फूलछाप पार्टी के गलियारों में चर्चा के साथ सवाल बन गया कि पूरी पटकथा असल में सिटिंग एमएलए के चचेरे भाई की खदान सील कर नेताजी का सियासी पंचनामा लिखने का महज खेल था या फिर प्रशासन के भरोसे के बाद प्रदर्शन की झांकी दिखाकर निर्मित करवाई लाइन ऑर्डर की स्थिति पर कोई जल्द बड़ी कार्रवाई होगी ?
टोल प्लाजा पर रंगदारी और मोर्चा अध्यक्ष की तैयारी
भाजपा युवा मोर्चा के जिलाध्यक्ष की कुर्सी पिछले दो वर्षों से इंतजार की कहानी बनी हुई है। प्रदेश में मोर्चा का मुखिया तय होने के बाद अब जिले के दावेदारों की दौड़ तेज हो गई है। लेकिन फूलछाप पार्टी ने जिलाध्यक्ष के नामों से पहले मापदंडों की नियमावली जारी कर दी और बस… यहीं कई अधेड़ों के सपने चकनाचूर हो गए। जो लोग पिछले एक दशक से इस कुर्सी के लिए दौड़ लगा रहे थे, उन्हें अब उम्र की सीमा याद दिला दी गई है। कुछ ऐसे चेहरे भी मैदान में हैं जिनके कानूनी पंचनामे पहले ही सुर्खियां बटोर चुके हैं। किसी ने टोल प्लाजा पर रिवॉल्वर दिखाने का कारनामा किया तो किसी का नाम पवन चक्कियों में कंपनी से काम लेने के किस्सों में उछल चुका है। रतलाम ग्रामीण से भी एक दावेदार इन दिनों लेन-देन कर अखबारों में वाहवाही छपवाकर खुद को पाकसाफ साबित करने में जुटे हैं, लेकिन उनके कारनामों की पूरी कुंडली पार्टी मुख्यालय पहुंच चुकी है। पार्टी का साफ संदेश है कि जिलाध्यक्ष वही बनेगा जिसका रिकॉर्ड साफ हो और जिसकी छवि जनता में बेहतर हो। ये अंदर की बात है… (This is an inside story!..) कि कुर्सी के दावेदार इन दिनों अपना काम-धंधा छोड़कर दिल्ली से लेकर भोपाल और जिले के बड़े नेताओं के आगे-पीछे चरणवंदन करते आसानी से देखे जा सकते हैं। क्योंकि राजनीति में कुर्सी मिल जाए तो बाकी धंधे खुद ही चलने लगते हैं।
स्वास्थ्य विभाग वेंटिलेटर पर, जिम्मेदार छुट्टी पर
जिले की स्वास्थ्य सेवाएं इन दिनों खुद ही इलाज की मोहताज नजर आ रही हैं। हालात ऐसे हैं कि लगता है मानो पूरा विभाग वेंटिलेटर पर पड़ा सांसें गिन रहा हो। ग्राम देथला में खसरा (मीजल्स) से मासूम की मौत हो या फिर टीकाकरण के बाद डेढ़ वर्षीय बालक की जान चली जाना। ये घटनाएं सिस्टम को झकझोरने के लिए काफी थीं। लेकिन सिस्टम की संवेदनाएं शायद छुट्टी पर चली गई हैं। उधर केंद्र और राज्य सरकार सर्वाइकल कैंसर से बचाव के लिए एचपीवी टीकाकरण अभियान चला रही हैं, मगर जिले की रफ्तार ऐसी है कि पूरे प्रदेश में 45वीं रैंक पर लुढ़क गई है। पिछले 24 दिनों में महज 1 हजार 868 किशोरियों को टीका लग पाया। जिला अस्पताल से लेकर ग्रामीण डिस्पेंसरी तक हालत ऐसे हैं कि सामान्य बुखार तो दूर सर्दी-खांसी के इलाज के लिए दूसरे शहर की शरण लेने को मरीज मजबूर है। ये अंदर की बात है… (This is an inside story!..) कि जैसे ही विभाग की नाकामियां उजागर होती हैं, स्वास्थ्य विभाग की मुखिया मैडम और जिला अस्पताल के साहब जवाब देने के बजाय छुट्टी पर चले जाते हैं। अब भोपाल स्वास्थ्य मुख्यालय भी हालात से वाकिफ हो चुका है और संकेत साफ हैं कि दोनों नाकाम के साथ निकम्मे जिम्मेदारों की रवानगी जल्द होने वाली है।
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