
रतलाम, वंदेमातरम् न्यूज। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने दुष्कर्म के कारण गर्भवती हुई एक नाबालिग को गर्भपात की अनुमति देते हुए महत्वपूर्ण आदेश जारी किया है। कोर्ट ने कहा कि पीड़िता और उसकी मां को रतलाम (Ratlam) की अदालत से समय पर राहत नहीं मिली, जिसके कारण उन्हें हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा। न्यायालय ने इसे चिंताजनक स्थिति बताया।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि विशेष पॉक्सो अदालतें ऐसे मामलों में मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) एक्ट, 1971 और संशोधित नियमों के तहत खुद भी गर्भपात की अनुमति दे सकती हैं। इसके लिए उन्हें निर्धारित मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) का पालन करना होगा, ताकि पीड़िताओं को अनावश्यक रूप से हाईकोर्ट न जाना पड़े।

रतलाम की नाबालिग से दुष्कर्म के बाद हुआ गर्भ
यह मामला रतलाम (Ratlam) जिले का है, जहां जनवरी 2022 में 16 वर्षीय नाबालिग के साथ दुष्कर्म किया गया था। आरोपी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 376, 506 और पॉक्सो एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया। घटना के बाद बालिका गर्भवती हो गई। 13 मार्च 2022 को औद्योगिक थाना रतलाम में एफआईआर दर्ज कराई गई थी।
रतलाम की कोर्ट ने झाड़ा था पल्ला
पीड़िता की मां ने विशेष पॉक्सो कोर्ट में आवेदन देकर गर्भपात की अनुमति मांगी थी। पक्ष की ओर से कहा गया कि बालिका नाबालिग है और दुष्कर्म के कारण गर्भवती हुई है, इसलिए MTP एक्ट के तहत गर्भसमापन की अनुमति दी जानी चाहिए। हालांकि, निचली अदालत ने यह कहते हुए आवेदन खारिज कर दिया कि यह उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं आता।
रतलाम अदालत का फैसला और हाईकोर्ट चुनौती
निचली अदालत के आदेश के खिलाफ पीड़िता की मां ने हाईकोर्ट की इंदौर बेंच में पुनरीक्षण याचिका दायर की। याचिका में रतलाम अदालत का आदेश निरस्त करने और ऐसे मामलों में स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करने की मांग की गई। मामले की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने आदेश जारी करते हुए कहा कि यदि ऐसे प्रकरण अदालतों के सामने आते हैं तो वे MTP एक्ट और उसके संशोधित नियम 2020 के तहत रजिस्टर्ड डॉक्टरों को गर्भपात की अनुमति दे सकती हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि ‘स्वप्रेरणा से लिया गया प्रकरण बनाम मध्यप्रदेश राज्य एवं अन्य’ मामले के निर्देशों का पालन किया जाए।
कोर्ट बोला- पीड़िता को अतिरिक्त पीड़ा झेलनी पड़ी
हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि गर्भपात जैसी संवेदनशील प्रक्रिया पहले से ही मानसिक और शारीरिक रूप से कठिन होती है। ऐसे में पीड़िता और उसके परिवार को बार-बार अदालतों के चक्कर लगाने और खर्च उठाने के लिए मजबूर करना अतिरिक्त पीड़ा देना है।
मां और वकील की सराहना
कोर्ट ने कठिन परिस्थितियों में न्याय के लिए संघर्ष करने पर पीड़िता की मां और उनके अधिवक्ता नीरज सोनी की सराहना की। साथ ही कहा कि डॉक्टरों और निचली अदालतों को ऐसे मामलों में संवेदनशीलता और तत्परता के साथ कानून के अनुरूप निर्णय लेना चाहिए।
मेडिकल रिपोर्ट बनी फैसले का आधार
रतलाम जिला अस्पताल की चिकित्सा समिति की रिपोर्ट इस मामले में अहम रही। समिति ने बताया कि पीड़िता 14 सप्ताह की गर्भवती है और कानूनी अभिभावक की सहमति से सुरक्षित रूप से गर्भपात कराया जा सकता है।
नाबालिगों के लिए क्या कहता है MTP कानून

MTP अधिनियम, 1971 के अनुसार 18 वर्ष से कम उम्र की गर्भवती लड़की के लिए कानूनी अभिभावक की लिखित सहमति जरूरी होती है। सामान्य परिस्थितियों में 20 सप्ताह तक गर्भपात की अनुमति है, जबकि विशेष मामलों में 2021 संशोधन के तहत 24 सप्ताह तक गर्भसमापन किया जा सकता है। इसमें नाबालिग भी शामिल हैं।
पॉक्सो एक्ट के तहत पीड़ित बच्चों को मिलते हैं ये अधिकार

पॉक्सो कानून के तहत पीड़ित बच्चे की पहचान गोपनीय रखी जाती है। बयान बाल-अनुकूल माहौल में दर्ज किया जाता है। पीड़िता बच्ची होने पर महिला पुलिस अधिकारी द्वारा बयान लिया जाना जरूरी है। इसके अलावा मुफ्त कानूनी सहायता, मनोवैज्ञानिक परामर्श, मुआवजा, सुरक्षा और त्वरित सुनवाई का अधिकार भी मिलता है। कानून के अनुसार ऐसे मामलों का ट्रायल एक वर्ष के भीतर पूरा किया जाना चाहिए।
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