
असीम राज पांडेय, रतलाम। रतलाम में इन दिनों प्रशासनिक गलियारों में एक नया प्रोटोकॉल चल पड़ा है। जनता को इंतज़ार कराओ, जनप्रतिनिधियों को टरकाओ और मौका मिले तो सरकार को भी भाव मत दो। जिले की कुर्सियों पर विराजमान महिला अफसरों की कार्यशैली आम चर्चा का विषय बनी हुई है। जनसुनवाई अब समस्याओं का मंच कम और फोटोसेशन का स्टूडियो ज्यादा नजर आने लगी है। फरियादी आते हैं, आवेदन देते हैं, कैमरे चमकते हैं, प्रेस नोट निकलता है और समस्या अगले मंगलवार तक स्थगित हो जाती है। हाल ही में रतलाम ग्रामीण क्षेत्र में मुख्यमंत्री कन्यादान योजना के तहत 167 जोड़े विवाह सूत्र में बंधे। आयोजन भव्य था, व्यवस्था चुस्त थी, कर्मचारी मुस्तैद थे, क्षेत्रीय माननीय सक्रिय थे। बस जो नहीं थे, वे जिले के बड़े अफसर थे। पहली बार ऐसा दृश्य दिखा कि मुख्यमंत्री नाम की योजना में जिले के वरिष्ठ अधिकारी ऐसे दूर रहे, मानो कार्यक्रम सरकारी नहीं, विपक्षी दल का शक्ति प्रदर्शन हो। महिला एवं बाल विकास विभाग, पंचायत और जनपद के कर्मचारी आयोजन संभालते दिखे, लेकिन जिले की मुखिया और नंबर-दो अफसर ने ऐसी दूरी बनाई जैसे बरसात में बिजली का खंभा हो। जनता अब कानाफूसी कर रही है कि जब सरकार की योजनाएं ही उपेक्षित हों, तो आम आदमी की फाइल किस खेत की मूली है। ये अंदर की बात है… (This is an inside story!) रतलाम में अब प्राथमिकता सूची बदल चुकी है, पहले जनता उपेक्षित थी, फिर जनप्रतिनिधि, अब सरकार भी कतार में आ गई है।

काम में नहीं किस्सों में व्यस्त है खाकी
जिले की खाकी इन दिनों बड़ी व्यस्त है। इतना व्यस्त कि अपराध रोकने का समय नहीं, लेकिन यह बताने का भरपूर समय है कि कितनी व्यस्त है। हालात ऐसे हैं कि अपराधी सक्रिय हैं, पुलिस प्रतिक्रियात्मक है और जनता भगवान भरोसे है। पिछले दिनों हत्या, चाकूबाजी और अन्य अपराधों का ग्राफ तेजी से बढ़ा। इसी बीच बंदीगृह में बंद एक आरोपी ने पायजामे के नाड़े से फंदा लगाकर जान दे दी और पूरे सिस्टम की नींद उड़ा दी। मगर नींद टूटी भी तो थोड़ी देर को। उसके बाद ग्रामीणों ने तालाब किनारे मोटर चोरी की शंका में युवकों का पीछा किया। एक युवक पकड़कर पुलिस को सौंपा और बताया कि दो साथी भाग गए हैं। पुलिस ने सूचना को भी नजर अंदाज किया। नतीजा यह निकला कि तीन दिन बाद उसी तालाब से दो लाशें बाहर आईं और खाकी की सुस्ती पानी के ऊपर तैरती नजर आई। थानेदार साहब लाइन हाजिर हुए, लेकिन बीट और माइक्रो बीट सिस्टम में तैनात वे कर्मवीर अब भी मैदान में हैं, जो घटना के बाद ग्रामीणों को समझा रहे थे कि “कुछ मत बोलना।” ये अंदर की बात है… (This is an inside story!) जिले के कई थानों में सिद्धांत साफ है, मलाईदार मामलों में फुर्ती दिखाओ, बाकी मामलों में व्यस्तता का व्याख्यान सुनाओ।
महापंचायत से पहले बढ़ा सियासी तापमान
दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेस-वे के नजदीक प्रस्तावित मेगा इंडस्ट्रियल पार्क के लिए भूमि अधिग्रहण का मुद्दा अब आदिवासी अंचल में जनआंदोलन बन रहा है। करीब 19 दिन पहले एक जनप्रतिनिधि के नेतृत्व में शुरू हुआ यह आंदोलन लगातार जोर पकड़ रहा है। अब इस आंदोलन का अगला बड़ा पड़ाव 26 अप्रैल को प्रस्तावित महापंचायत है, जिस पर पूरे इलाके की नजरें टिकी हैं। पूरे मामले में जिम्मेदारों की लापरवाही और संवादहीनता ने हालात को यहां तक पहुंचाया है। जल, जंगल और जमीन के सवाल पर लड़ रहे आदिवासी समाज में नाराजगी साफ दिखाई दे रही है। वनाधिकार कानून की भावना यह कहती है कि जिन समुदायों का वर्षों से जंगल की जमीन पर जीवन-यापन रहा है, उनके अधिकारों को मान्यता मिले। चुनावी मंचों से इस कानून का खूब गुणगान हुआ, लेकिन अब उसी वादे की कसौटी पर प्रशासन घिरता नजर आ रहा है। यदि अधिकारियों ने वातानुकूलित दफ्तरों से बाहर निकलकर गांवों में जाकर संवाद किया होता, लोगों का विश्वास जीता होता, तो यह स्थिति नहीं बनती। अब यही मुद्दा सरकार के ड्रीम प्रोजेक्ट के सामने चुनौती बनकर खड़ा है। ये अंदर की बात है… (This is an inside story!) कि सरकार विकास और जनहित के दावे चाहे जितने करे, लेकिन कई बार अफसरशाही की उदासीनता सारी तस्वीर बिगाड़ देती है। इलाके में चर्चा है कि 26 अप्रैल की महापंचायत से पहले प्रशासन भीड़ जुटने पर रोक लगाने जैसा कोई फरमान जारी कर सकता है। फिलहाल आंदोलन और सियासत दोनों का तापमान इस मुद्दे पर काफी बढ़ा हुआ है।
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