
असीम राज पांडेय, रतलाम। रतलाम की खाकी इन दिनों ऐसे करंट में है कि चोरी के 19 मामलों को एक ही झटके में निपटा दिया। पिछले 434 दिनों से थाने के चक्कर काट रही “हवा से बिजली” बनाने वाली कंपनी को आखिरकार शुक्रवार रात 11:23 बजे न्याय का “शुभ मुहूर्त” मिल ही गया। पहले तो थाने के जिम्मेदारों ने फरियादी की चप्पलें घिसवाने में कोई कसर नहीं छोड़ी, लेकिन जैसे ही ऊपर से “मोबाइल घनघनाए”, दिल पिघल गया और एफआईआर का दरवाजा खुल गया। कहते हैं, हवा से बिजली बनाने वाली कंपनी का करंट ऐसा दौड़ा कि खाकी की नसों में भी वोल्टेज बढ़ गया। ये अंदर की बात है… (This is an inside story!) कि चोरी गए करोड़ों के सामान की भरपाई तो कोई नहीं कर पाएगा, लेकिन बीमा कंपनी के सहारे 80-90% मुनाफे का “प्रकाश” जरूर फैलाया जा रहा है। और हां, इस पूरी प्रक्रिया में “सेवा शुल्क” भी नियमों के अनुसार ही वसूला गया, क्योंकि थानों की नियमावली नहीं तोड़ी जा सकती।

“बुलाती है मगर जाने का नहीं” चर्चा में है इसलिए
मशहूर शायर राहत इंदौरी का शेर इन दिनों रतलाम की गलियों में गूंज रहा है “बुलाती है मगर जाने का नहीं…” और इस शेर को साकार किया माननीय मंत्रीजी के हालिया दौरे ने। मंत्रीजी के जन्मदिन का जश्न 39 दिन पहले ही आतिशबाजी और केक के साथ मना लिया। इतनी दूरदर्शिता तो मौसम विभाग में भी नहीं होती! सोशल मीडिया पर लाइक और कमेंट्स की बरसात ने इस भव्योत्सव को और भी ऐतिहासिक बना दिया। लेकिन असली कहानी तब शुरू हुई जब मंत्रीजी खुद बोले कि वे चुनाव में इसलिए नहीं गए क्योंकि “पुलिस पकड़ लेगी।” यह बयान सुनकर जनता से लेकर पार्टी तक सब चौंक गए। और सबसे दिलचस्प बात मंत्रीजी के दौरे में उनके ही विभाग के अफसर-चाकर नदारद! प्रोटोकॉल भी शायद उस दिन छुट्टी पर था। पार्टी के कई बड़े चेहरे भी मंच से गायब रहे। ये अंदर की बात है…(This is an inside story!) कि सभी ने हालात भांप लिए थे“अभी वहां जाना मतलब सिर्फ नुकसान।” इसलिए सबने राहत इंदौरी के शेर को दिल से अपनाया और दूरी बनाए रखी।
हजार करोड़ का सपना और 90 लाख की हकीकत
शहर में एक नई फिल्मी कहानी चल रही है, जिसमें हीरो भी वही है और विलेन भी तारा उर्फ अख्तर। एक हजार करोड़ की चमक-दमक वाले इस किरदार की हकीकत तब सामने आई जब मात्र 90 लाख की धोखाधड़ी का मामला दर्ज हुआ। अनाज के व्यापार से लेकर गोल्ड माइनिंग तक के सपने दिखाने वाला यह “महानायक” कागजों में तो अरबों का मालिक निकला, लेकिन असल में कहानी कुछ और ही थी। लोन लेने के लिए कंपनियों का जाल बुना गया, और दिवालिया घोषित होने के लिए अलग-अलग किरदार खड़े कर दिए गए। कोई फरियादी बना, कोई रक्षक और असली खिलाड़ी पर्दे के पीछे से पूरी स्क्रिप्ट लिखता रहा। यह कहानी सिर्फ एक धोखाधड़ी की नहीं, बल्कि एक ऐसे रंगमंच की है जहां हर किरदार अपना रोल बखूबी निभा रहा है। फर्क बस इतना है कि यहां दर्शक बैंक हैं और तालियां नहीं, बल्कि कुर्की का डर गूंज रहा है। ये अंदर की बात है…(This is an inside story!) कि अख्तर का जहाज डूबा नहीं है, बस मंच बदल गया है और नाटक जारी है।
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