
रतलाम, वंदेमातरम् न्यूज। पूज्य महासती प्रफुल्लाश्रीजी म.सा. ने रतलाम (Ratlam) में धर्मसभा में भगवान महावीर के गुणों का स्मरण कराते हुए कहा कि जीवन में सम्यक्त्व अर्थात सही दृष्टि और समता भाव का होना सबसे बड़ा धर्म है। उन्होंने कहा कि भगवान महावीर की दृष्टि सभी जीवों के प्रति समान थी। उनके लिए गौतम स्वामी, चंदनबाला, गोशालक अथवा उन्हें कष्ट पहुंचाने वाला संगम देव सभी समान थे। प्रभु के गुणों की महिमा का कोई पार नहीं है और संसार की सभी उपमाएं उनके समक्ष छोटी पड़ जाती हैं।
समता के बिना कठोर तप भी निष्फल
महासतीश्री ने कहा कि यदि जीवन में सम्यक्त्व और समता भाव नहीं है तो महीनों तक किया गया मासक्षमण जैसा कठोर तप भी केवल बाल तप बनकर रह जाता है। वहीं, यदि अंतर्मन में समता का भाव है तो एक दिन का साधारण उपवास भी आत्मकल्याण का महान साधन बन जाता है। उन्होंने कहा कि यह सब व्यक्ति की श्रद्धा और दृष्टिकोण पर निर्भर करता है। इसे स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा, “मानो तो मैं गंगा मां हूं, न मानो तो बहता पानी।”
भोजन में नखरे और क्रोध से बचने की सीख
धर्मसभा में महासतीश्री ने भगवान महावीर और चंदनबाला का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि प्रभु ने चंदनबाला द्वारा अर्पित रूखे-सूखे उड़द के बाकुले भी पूर्ण समता भाव से स्वीकार किए थे। उन्होंने कहा कि भोजन करते समय कभी क्लेश, नखरे या क्रोध नहीं करना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति क्रोध में आकर भोजन छोड़ देता है तो वह नारकीय कर्मों का बंधन करता है। इसके विपरीत समता भाव से की गई एक नवकारसी भी जीव को मुक्ति के मार्ग पर अग्रसर कर सकती है।
मुस्कुराकर जिएं, मन की थकान से बचें
महासतीश्री ने कहा कि जीवन में आने वाली कठिनाइयों को सहन करते हुए भी मुस्कुराना सीखना चाहिए। दुनिया में आगे बढ़ने वाले वही लोग हैं, जो विपरीत परिस्थितियों में भी सकारात्मक बने रहते हैं। उन्होंने कहा कि जीवन को मजबूरी में नहीं, बल्कि जिंदादिली के साथ जीना चाहिए, क्योंकि मन की थकान व्यक्ति को जीते-जी समाप्त कर देती है।
संसार में रहें, लेकिन मोह-ममता से दूर
प्रवचन में उन्होंने संसार में रहते हुए विरक्ति का संदेश भी दिया। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार बैंक का कैशियर दिनभर करोड़ों रुपये गिनता है या नर्स पूरे समर्पण से मरीजों की सेवा करती है, लेकिन ड्यूटी समाप्त होने पर बिना किसी मोह के अपने घर लौट जाती है, उसी प्रकार मनुष्य को भी अपने कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन करना चाहिए, लेकिन किसी वस्तु या व्यक्ति के प्रति अंधा मोह नहीं रखना चाहिए।उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि सोना तिजोरी में आराम करता है, जबकि उसकी चिंता में मनुष्य अपनी नींद तक खो देता है। इसलिए संसार में रहते हुए केवल अपने दायित्व निभाएं, लेकिन ममता और आसक्ति से स्वयं को मुक्त रखें।
‘जो प्राप्त है, वही पर्याप्त है’
महासतीश्री ने कहा कि यदि मन संसार की दौड़-भाग से थकने लगे तो संयम का मार्ग अपनाएं या गृहस्थ रहते हुए भी संयमित जीवन जिएं। उन्होंने लोगों को उपभोक्तावाद और दिखावे की संस्कृति से बचने की प्रेरणा देते हुए कहा कि विज्ञापनों और चकाचौंध से प्रभावित होकर अनावश्यक इच्छाएं न बढ़ाएं। सम्यक्त्व का मूल संदेश यही है कि “जो प्राप्त है, वही पर्याप्त है।” उन्होंने श्रद्धालुओं से समता, संतोष और संयम को जीवन का आधार बनाने का आह्वान किया।
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