
रतलाम, वंदेमातरम् न्यूज। मध्य प्रदेश के रतलाम (Ratlam) जिला मुख्यालय स्थित बागड़ों का वास अगरजी का मंदिर जैन मंदिर नहीं, बल्कि सनातन मंदिर है। इसको लेकर वर्ष 1954 से विवाद चल रहा है, जो वर्तमान में न्यायालय में विचाराधीन है। महाशिवरात्रि पर भगवान श्री चौमुखा महादेव का अभिषेक, शिव विवाह, महाआरती सहित अन्य धार्मिक कार्यक्रम किए गए थे। इसके बाद प्रसादी वितरित की गई। इस दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे और प्रसादी ग्रहण की। इस संबंध में जैन समाज के कुछ लोगों द्वारा तथ्यों को तोड़-मरोड़कर, भड़काऊ भाषा का उपयोग करते हुए एक सामान्य घटना को मनगढ़ंत रूप देकर शांति प्रिय समाजों के बीच अनावश्यक खाई पैदा करने की दुर्भावना से रतलाम प्रशासन को ज्ञापन सौंपा गया।
यह बात श्री सनातन धर्मसभा एवं श्री महारुद्र यज्ञ समिति के अध्यक्ष अनिल झालानी ने कही। न्यू रोड स्थित श्री सज्जन ब्राह्मण बोर्डिंग में आयोजित प्रेसवार्ता में उन्होंने बताया कि ज्ञापन में मंदिर के अंदर की मूर्तियों से छेड़छाड़ करने और जमीकंद ले जाने का आरोप लगाया गया है। कलाकंद और आलू की चिप्स का उपयोग फलाहारी मानकर उपवास में किया गया था। छप्पन भोग में भी शास्त्रानुसार आलू का प्रयोग होता है। मंदिर में स्थापित किसी भी मूर्ति के साथ छेड़छाड़ नहीं की गई। उन्होंने आरोप लगाया है कि वहां रखे डस्टबिन को गिराकर बनाए गए वीडियो को सोशल मीडिया पर वायरल किया गया। इसमें एआई तकनीक का उपयोग किया गया है। मंदिर शासन के अधीन है और अधिकारियों की उपस्थिति में ही धार्मिक कार्यक्रम किए गए थे।
जैन देवालय प्रमाणित नहीं होता, कोर्ट दे चुका आदेश
झालानी ने बताया कि 24 जुलाई 2007 को Ratlam में द्वितीय अपर जिला न्यायाधीश राजीव भटजीवाले द्वारा दिए गए निर्णय में स्पष्ट उल्लेख है कि तथ्यों के आधार पर श्री शांतिनाथ जैन मंदिर, जिसे अगरजी का मंदिर कहा जाता है, मूर्तिपूजक जैन समाज का जैन देवालय प्रमाणित नहीं होता। साथ ही जैन समाज प्रतिवादियों से इस देवालय का आधिपत्य एवं नियंत्रण प्राप्त करने का अधिकारी भी नहीं पाया गया। अतः वादी का वाद सव्यय निरस्त किया गया। इसके बाद प्रतिवादी पक्ष द्वारा मामले को लेकर हाईकोर्ट में अपील की गई, जहां से प्रकरण विचाराधीन है। उन्होंने कहा कि मंदिर में लाल पत्थर से निर्मित शिव बारात सहित अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियां थीं, जिन्हें दबा दिया गया। पूर्व में जीर्णोद्धार के नाम पर जैन समाज के कुछ लोगों ने कई मूर्तियों के साथ छेड़छाड़ कर मंदिर का विस्तार किया तथा प्राचीन मूर्तियों के साथ भी टेंपरिंग की गई। उन्होंने मांग की है कि मामले की जांच भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) से कराई जाए। आपसी संवाद से मामले का समाधान निकाला जाए। उनकी मांग है कि श्री चौमुखा महादेव की जलाधारी का निर्माण किया जाए तथा मंदिर का शिखर बनाया जाए। यदि जैन समाज की ओर से आगे कोई कार्रवाई की जाती है तो उसका जवाब दिया जाएगा। सनातन समाज सद्भावना चाहता है, लेकिन उनकी ओर से सद्भावना भंग की गई है। एक प्रश्न के उत्तर में झालानी ने कहा कि ज्ञापन देने के लिए दबाव बनाया गया था, लेकिन बड़ी संख्या में लोगों के एकत्रित होने से व्यवस्था बिगड़ने की आशंका थी इसलिए हमने अभी प्रेसवार्ता के माध्यम से अपनी बात रखी।
शिवलिंग को उखाड़कर फेंक दिए जाने के बाद से जारी है विवाद
वरिष्ठ सदस्य रमेश व्यास ने कहा कि वे पिछले 50 वर्षों से उक्त Ratlam के प्राचीन सनातनी मंदिर के संबंध में कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। न्यायालय में प्रस्तुत तथ्यों के आधार पर मंदिर को जैन मंदिर नहीं माना गया है। उन्होंने कहा कि वर्ष 1954 में मंदिर में विराजित शिवलिंग को उखाड़कर फेंक दिए जाने के बाद से विवाद जारी है। इस दौरान वैदिक जागृति पीठ के महर्षि संजय शिवशंकर दवे, पंडित संजय ओझा (गामोठ), श्री सनातन धर्मसभा के उपाध्यक्ष राजेंद्र शर्मा ने भी विचार व्यक्त किए। प्रेसवार्ता में महामंडलेश्वर गुरुदेव देवस्वरूपानंद जी महाराज, गुरुदेव सुजानानंद जी महाराज, अगरजी मंदिर के पुजारी पंडित हरिश चतुर्वेदी, समिति महामंत्री नवनीत सोनी, अधिवक्ता बाबूलाल त्रिपाठी, राजेश दवे, पंडित रामचंद्र शर्मा, बंसीलाल शर्मा, बृजेंद्र मेहता, कैलाश झालानी, जनक नागल, जुगल पंड्या, नीलेश सोनी सहित अन्य पदाधिकारी उपस्थित रहे।
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