असीम राज पाण्डेय, रतलाम। फूलछाप पार्टी में एक नेताजी इन दिनों “चेहरा चमकाओ” अभियान के तहत नए अवतार में लौटे हैं। अहिल्याबाई होल्कर की 300वीं जयंती आई नहीं कि नेताजी अपने कुर्ते की सलवटें सीधी कर मैदान में उतर गए। पहले जो मैट और मानस भवन में रोड़े अटकाते थे, आज वही नेताजी हर बैनर पर खुद को चिपकाए बैठे हैं। अब इसे आत्मा की पुकार कहें या कुर्सी का खुमार। नेताजी ने वो सब किया जो एक “संभावित पदाधिकारी” के प्रमोशन पैकेज में शामिल होता है। फोटो खिंचवाई, प्रेस रिलीज बंटवाई, और अखबार में अपना नाम छपवाने के लिए मान-मनौव्वल पहुंचाई। लेकिन… नेताजी की इस पैतरेबाजी को संगठन और कार्यकर्ता सब जानते हैं कि नेताजी सब कुछ चेहरा चमकाने के लिए कर रहे हैं। जो पहले पार्टी के अंदर दंगल रचते थे, आज मां अहिल्या के नाम पर चेहरा चमका रहे हैं। ये अंदर की बात है… कि नेताजी का उद्देश्य मां अहिल्याबाई को आदरांजलि नहीं सिर्फ “सूची में नाम और कुर्सी से काम” है। अब देखना ये है कि नेताजी को लेकर पार्टी कितनी गंभीर है।
मेले का खेल अब हाथ रंगने वालों के पास
शहर में मेला तो लगा, लेकिन मेला मैदान में लगे तंबुओं से पहले अफसरों की जेबें तनी। मेला संचालन के नाम पर जितनी जमीन दी गई थी, उससे 13 गुना कब्जा कर शासन को जो चपत मारी गई वो किसी आम कर्मचारी ने नहीं, सधे हुए ऊपरी कलाकारों ने रची थी। जब वंदेमातरम् न्यूज ने पूरे मामले की परतें उधेड़ीं तो विभाग की नींद खुली। मेला शुरू हुए 15 दिन हो गए थे, तब बड़े बाबू की “सोती हुई कलम” जागी और नोटिस निकलवाया गया। अब साहब सफाई देते घूम रहे हैं कि हमने तो संज्ञान में आते ही कार्रवाई की। ये अंदर की बात है… कि जब सारा “खेल” चल रहा था, तब यही साहब सेकंड नंबर पर बैठकर गोटियां बिछा रहे थे। बाबूजी की हालत अब ऐसी है कि दिन का चैन और रात की नींद गायब है। डर है कहीं शिकायत का अगला लिफाफा मुख्यालय तक न पहुंच जाए। कहने को तो कह रहे हैं “हम जिम्मे बरी हैं”, पर शहर कह रहा है – “बरी तो मेला संचालक हुआ है!” मेले का खेल अब हाथ रंगने वालों के पास पहुंच गया है, जिसके परिणाम आने वाले दिनों में नजर आएंगे।
खाकी में थाने को लेकर चल रही कुर्सी रेस
पुलिस लाइन में इन दिनों “थाने पर तैनाती” को लेकर अघोषित ओलंपिक चल रही है। तीन तारों और दो तारों वाले साहब और साहिबान लाइन में खड़े हैं। लेकिन नजरें कप्तान के मिजाज और मूड पर टिकी हैं। थानों पर पहले से चाक-चौबंद साहब लोग खुद को थामे हुए हैं, लेकिन डर है कि अगर कोई गलती हुई तो कप्तान उन्हें सीधे लाइन में जमा कर नया खिलाड़ी मैदान में उतार देंगे। खाकी महकमे में अब “सट्टा बाजार” भी एक्टिव है। चर्चा गर्म है किसे कौन-सा थाना मिलेगा, किसकी सिफारिश काम आएगी और कौन सिर्फ लाइन में रहेगा? ये अंदर की बात है… कि पुराने थानेदार अब नेताओं के अलावा मीडिया वालों से यारी गांठ रहे हैं, और नए आमद देने वाले अपने पुराने बैचमेट्स से लेकर अफसरों को मोबाइल घनघनाकर कप्तान तक अपनी पहुंच बताने में जुटे हैं। देखना दिलचस्प होगा कि इस खाकी की शतरंज में कौन बनेगा राजा और कौन रहेगा प्यादा। जो आने वाले दिनों में चलेगा पता।
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