


रतलाम, वंदेमातरम् न्यूज। मध्य प्रदेश के रतलाम (Ratlam) जिले के ग्राम कुंवरवाड़ा, तहसील रावटी स्थित प्रसिद्ध शासकीय मंदिर श्री नागेश्वरजी की बेशकीमती भूमि पर निजी स्वामित्व का दावा करने वाले वादी की अपील को सप्तम जिला न्यायाधीश रतलाम राजेश नामदेव की कोर्ट ने खारिज कर दिया है। कोर्ट ने राजस्व अभिलेखों, खसरा-खतौनी एवं अन्य दस्तावेजों के परीक्षण के आधार पर विवादित भूमि को शासकीय मंदिर की भूमि माना है। साथ ही भूमि पर राज्य शासन का स्वत्व एवं स्वामित्व बरकरार रखा है।



प्रकरण में राज्य शासन की ओर से पैरवी कर रहे शासकीय अधिवक्ता समरथ पाटीदार ने बताया कि विवादित भूमि को लेकर वर्ष 1984 से विवाद चला आ रहा है। अतिरिक्त व्यवहार न्यायाधीश, सैलाना ने 31 अक्टूबर 2025 को निर्णय पारित करते हुए रावटी निवासी कृष्णा कुमार पिता मांगीलाल तेली एवं अन्य का दावा निरस्त कर दिया था। इसके बाद कृष्णा कुमार ने उक्त निर्णय के विरुद्ध जिला न्यायालय में अपील प्रस्तुत की थी। अपील की सुनवाई के दौरान न्यायालय ने पाया कि वादी विवादित भूमि पर 60 वर्ष से अधिक समय से शांतिपूर्ण एवं निरंतर कब्जे और खेती करने का दावा तो करता है, लेकिन वह यह स्पष्ट रूप से प्रमाणित नहीं कर सका कि उसका कब्जा किस निश्चित तारीख से शुरू हुआ और किस प्रकार वास्तविक स्वामी के अधिकार के प्रतिकूल रहा।



केवल कब्जे से नहीं सिद्ध होता आधिपत्य
रतलाम कोर्ट ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि किसी भूमि पर लंबे समय तक कब्जा मात्र होने से प्रतिकूल आधिपत्य (Adverse Possession) के आधार पर स्वामित्व का अधिकार प्राप्त नहीं हो जाता। इसके लिए कब्जे की शुरुआत की निश्चित तारीख, कब्जे की प्रकृति और वास्तविक स्वामी के अधिकार के प्रतिकूल कब्जा होने के संबंध में स्पष्ट एवं विश्वसनीय प्रमाण प्रस्तुत करना आवश्यक है। वादी द्वारा ऐसे पर्याप्त दस्तावेज एवं साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किए गए, जिनसे विवादित भूमि पर उसका स्वामित्व सिद्ध हो सके।
मंदिर की भूमि कलेक्टर प्रबंधक के रूप में दर्ज
कोर्ट ने राजस्व अभिलेखों, खसरा, खतौनी और अन्य दस्तावेजों का परीक्षण करने के बाद माना कि विवादित भूमि ग्राम कुंवरवाड़ा स्थित श्री नागेश्वरजी मंदिर की है। अभिलेखों में मंदिर की भूमि के प्रबंधक के रूप में कलेक्टर, रतलाम का नाम दर्ज है। इसके विपरीत वादी ऐसा कोई वैध दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सका, जिससे वह भूमि का स्वामी सिद्ध हो।
1984 से विवाद, कई बार कोर्ट पहुंचा मामला
विवादित भूमि को लेकर वर्ष 1984 में व्यवहार वाद दायर किया गया था, जिसे वर्ष 1992 में निरस्त कर दिया गया। इसके विरुद्ध प्रस्तुत प्रथम अपील भी वर्ष 1992 में खारिज हो गई थी। इसके बाद दायर द्वितीय अपील का भी वर्ष 2011 में निराकरण हो चुका था। इसके बावजूद वर्ष 2016 में पुनः समान प्रकृति का व्यवहार वाद प्रस्तुत किया गया। न्यायालय के समक्ष इन तथ्यों को भी रखा गया, जिसके बाद बार-बार समान प्रकृति के दावे प्रस्तुत किए जाने को लेकर न्यायालयीन प्रक्रिया के दुरुपयोग का मुद्दा सामने आया।
बेदखली की कार्रवाई को कोर्ट ने माना वैध
कोर्ट ने यह भी माना कि वादी के विरुद्ध अतिक्रमण संबंधी कार्रवाई एवं कारण बताओ सूचना पत्र जारी किए गए थे। कलेक्टर और तहसीलदार द्वारा वादी के कब्जे में किसी प्रकार का अवैध हस्तक्षेप नहीं किया गया है। शासकीय भूमि से अतिक्रमण हटाने के लिए शासन द्वारा की जा रही वैधानिक कार्रवाई को न्यायालय ने अवैध हस्तक्षेप नहीं माना।
कलेक्टर और तहसीलदार को कार्रवाई की स्वतंत्रता
रतलाम जिला कोर्ट ने निर्णय की प्रति कलेक्टर रतलाम एवं तहसीलदार रावटी को भेजने के निर्देश दिए हैं। साथ ही उन्हें विधि के अनुसार आगे की कार्रवाई करने की स्वतंत्रता दी है। इस मामले में राज्य शासन की ओर से प्रभावी पैरवी शासकीय अधिवक्ता समरथ पाटीदार ने की।

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