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Friday, March 1, 2024

शक्ति को सलाम : उम्र 72 वर्ष लेकिन जीने का जज्बा बरकरार, संकल्पित हैं प्रेरणा देने के लिए

असीमराज पांडेय
रतलाम, वंदेमातरम् न्यूज।

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर हम एक ऐसी शख्सियत को सलाम कर रहे हैं जिन्होंने 72 वर्ष की उम्र के पड़ाव पर भी हार नहीं मानी। जिंदगी के रास्ते में कई मुश्किलें सहीं, लेकिन मुश्किलों के सामने हार न मानते हुए जीत ही हासिल की। वंदेमातरम् न्यूज की ओर से हम ऐसी शक्ति को सलाम करते हैं जो बड़ी-बड़ी चुनौतियों के बावजूद संकल्पित है हार नहीं मानने के लिए…।
मुखर्जीनगर में छोटे से कमरे में जमीन पर बैठीं 72 वर्षीय दुर्गाबाई जोशी की झुर्री से भरी आंखों में जिंदगी की परेशानियों को आसानी से देखा जा सकता है। इसके बाद भी चेहरे पर जीने की उमंग और आत्मविश्वास साफ झलकता है। वंदेमातरम् न्यूज की ओर से महिला दिवस पर दुर्गाबाई जोशी की जीवट्टता से इसलिए रूबरू कराया जा रहा है ताकि चंद मुश्किल आने पर जिंदगी से हार मानने वालों को प्रेरणा मिल सके।

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5 फरवरी 2022 को जीवनसाथी भेरूलाल जोशी को मुखाग्नि देते हुए दुर्गाबाई जोशी।

पिछले आठ वर्षों से दुर्गाबाई जोशी ने दूसरों के घरों में खाना बनाने का काम कर प्रतिमाह मिलने वाले मेहनताने से बीमार पति भेरूलाल जोशी की सेवा की। 5 फरवरी 2022 को जीवनसाथी भी उम्र के इस मोड़ पर साथ छोड़ चुके। इसके बाद भी दुर्गाबाई ने हार नहीं मानी। सात फेरे लेकर जीवन की डोर बांधने वाली दुर्गाबाई ने मुक्तिधाम पर स्वर्गीय भेरूलाल जोशी को मुखाग्नि देकर सभी रस्में निभाई। वंदेमातरम् न्यूज से चर्चा के दौरान दुर्गाबाई ने बताया कि उनका एक पुत्र था, गलत रास्ते पर जाने के बाद उससे किनारा कर लिया और जिंदगी की लड़ाई खुद लडऩा शुरू कर दी। वर्ष-2012 में जब पति भेरूलाल गंभीर बीमार हुए तो उनके उपचार में कोई कसर न छूटे इसके लिए ज्यादा से ज्यादा घरों में काम करना शुरू किया। सुबह से शाम तक दूसरों के घरों में काम कर मेहनताना स्वरूप मिलने वाली राशि से बीमार पति का उपचार करवाती थी। पति भेरूलाल जोशी के निधन के बाद भी दुर्गाबाई नहीं टूटी है उन्होंने अंतिम सांस तक किसी दूसरे पर आश्रित न होकर स्वयं जीवट्टता से जीने के लिए प्रतिबद्ध हैं। मंगलवार को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर उन्होंने नारियों को संदेश दिया है कि जीवन में परेशानियां तो मोड़ दर मोड़ पर मिलेंगी, लेकिन हमें इससे हार नहीं मानना है और आत्मविश्वास के साथ लड़ते रहना ही जीवन का पर्याय है।

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