
असीम राज पांडेय, रतलाम। फूलछाप पार्टी के दो दिवसीय प्रशिक्षण वर्ग में इस बार सिद्धांतों से ज्यादा कैमरों की फ्लैश चमकी। वजह बने वही नेताजी, जिनकी पहचान पार्टी अनुशासन से कम और टोल प्लाजा पर धमकीशास्त्र के प्रायोगिक ज्ञान से ज्यादा है। कभी रिवॉल्वर की चमक, कभी मोबाइल पर धमकी भरी आवाज और कभी एफआईआर की सुर्खियां…। यह नेताजी भी प्रशिक्षण में पूरे आत्मविश्वास से पहुंचे, मानो अनुशासन का पाठ पढ़ने का विशेष आमंत्रण मिला हो। सूत्र बताते हैं कि मंच पर भले विचारों का मंथन चल रहा था, लेकिन नेताजी का पूरा ध्यान फोटो सेशन पर केंद्रित था। बड़े नेताओं के साथ तस्वीरें खिंचीं, मुस्कानें बिखरीं और सोशल मीडिया पर ब्रांडिंग का ऐसा शंखनाद हुआ कि मानो पार्टी नहीं, निजी प्रतिष्ठान का प्रचार अभियान चल रहा हो। ये अंदर की बात है…(This is an inside Story…) कि नेताजी को पार्टी का झंडा सिर्फ कारोबार के लिए मुफीद लगता है। सिद्धांतों से उनका रिश्ता वैसा ही है जैसा बारिश में कागज़ी छाते का। मजे की बात यह है कि पार्टी में अनुशासन का डंडा अक्सर उन्हीं कार्यकर्ताओं पर चलता है जो भीड़ बढ़ाने का काम करते हैं, जबकि रसूखदारों पर संगठन का आशीर्वाद कुछ नजर अंदाज करने वाला ही नजर आता है।
चौखट पर जनप्रतिनिधि बन चुकी सिस्टम की नई उपलब्धि
जिले में सरकारी सिस्टम ने निष्पक्षता की ऐसी मिसाल कायम की है कि अब सुनवाई नहीं होने से सिर्फ आम जनता ही नहीं, खुद जनप्रतिनिधि भी परेशान हैं। जनसुनवाई के नाम पर जनता पहले ही चप्पलें घिस रही थी, अब नेताजी भी उसी कतार के खड़े दिखाई दे रहे हैं। हालिया मामला तब चर्चा में आया जब एक पूर्व मंत्री ने अपने करीबी के भूखंड विवाद को लेकर खाकी के बड़े साहब से शिकायत की। सात दिन तक फाइल ने करवट नहीं ली तो हालात ऐसे बने कि पूर्व मंत्री को साहब के चैंबर के बाहर जमीन पर बैठकर विरोध दर्ज कराना पड़ा। सत्ता पक्ष में रहते हुए धरने की यह दुर्लभ तस्वीर देखने वालों ने भी खूब ताली बजाई। इससे पहले जिले के एक विधायक और महिला जनप्रतिनिधि भी जिले की मुखिया की चौखट पर अपनी सुनवाई का इंतजार कर चुके हैं। हालत यह है कि सत्ता में रहकर भी कोई सुन नहीं रहा का दर्द अब खुलकर बयान होने लगा है। ये अंदर की बात है… (This is an inside Story…) कि जिले का सिस्टम इन दिनों मनमानी का ऐसा अनलिमिटेड रिचार्ज भर चुका है कि आम और खास के फर्क की बैटरी भी डिस्चार्ज हो चुकी है।

शहर में जलसंकट नहीं मानो जलोत्सव चल रहा
शहर में पानी अब नल से कम और भोपू से ज्यादा बह रहा है। रोज घोषणा होती है “तकनीकी कारणों से जल वितरण कल होगा।” जिम्मेदारों ने मानो जलसंकट का समाधान नहीं, सूचना प्रसारण का ठेका ले रखा हो। इधर शहरी सीमा से लगे इलाके की एक मल्टी में पानी नहीं पहुंचा तो लोग सड़क पर उतर आए। चक्काजाम हुआ, नाराजगी फूटी और प्रशासन सक्रिय मुद्रा में दिखाई दिया। टैंकर भेजे गए, आश्वासन बांटे गए और कर्तव्य पालन का फोटो खिंच गया। लेकिन असली जलसेवा कहीं और चल रही थी। विरोध प्रदर्शन के बीच ही रेलवे के खेल मैदान में क्रिकेट मैच से पहले पीच की प्यास बुझाने के लिए नियमों को किनारे रख फॉयर लॉरी पहुंच गई। पानी ऐसा बहाया गया मानो शहर में जलसंकट नहीं, जलोत्सव चल रहा हो। जनता नलों की सूखी टोंटियां घुमाती रही और मैदान हरी उम्मीदों से चमकता रहा। ये अंदर की बात है… (This is an inside Story…) कि निगम के एक उपयंत्री इन दिनों खुद को सुपर कमिश्नर समझ बैठे हैं। नियम उनके लिए सुझाव हैं और संसाधन व्यवहार कुशलता के उपकरण। कभी निर्माण सामग्री के किस्से, कभी मैदान पर पानी की मेहरबानी… लगता है प्रशासनिक सेवा नहीं, निजी प्रबंधन का नया मॉडल चल रहा है।
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