
असीम राज पांडेय, रतलाम। रतलाम की फोरलेन इन दिनों सिर्फ ट्रकों की आवाजाही के लिए नहीं, बल्कि “डोडा दरबार” की रहस्यमयी कहानियों के लिए भी मशहूर हो चली है। हाल यह है कि केंद्रीय नारकोटिक्स की टीम ने माह के पहले ही सप्ताह में ऐसे-ऐसे ट्रक पकड़ लिए जिनमें डोडाचूरा थोड़े में नहीं, मानो थोक मंडी के हिसाब से भरा था। अब सवाल यह है कि जब बाहर से आई टीम को सब दिखाई दे गया तो जिले की खाकी की दूरबीन आखिर किस दिशा में लगी हुई थी? जिले के कुछ ढाबों की हालत भी बड़ी दिलचस्प है। बाहर से देखो तो चूल्हा ठंडा, ग्राहक गायब और कर्मचारी ऐसे बैठे मिलेंगे जैसे बरसों से किसी ग्राहक का इंतजार कर रहे हों। लेकिन कोई अनजान आदमी चाय पूछ ले तो उससे ऐसी पूछताछ होती है जैसे थाने में हिस्ट्रीशीटर की हो रही हो। मतलब दाल में कुछ नहीं, पूरी दाल ही काली है। ये अंदर की बात है…( inside story) कि इन ढाबों में शाम ढले ट्रकों की आवाजाही बढ़ जाती है और “माल” की भाषा में बातचीत होती है। अब यह माल आलू-प्याज है या कुछ और, यह तो जिम्मेदार ही बेहतर जानते होंगे। फिलहाल “नशे से दूरी” वाले पोस्टर जरूर दीवारों पर मुस्कुरा रहे हैं और तस्करी का खेल फोरलेन की धूल में बेखौफ दौड़ रहा है।

जेल में कानून नहीं दबा दी जाती इंसानियत
जिला जेल इन दिनों सुधारगृह कम और सवालों का कारागार ज्यादा बन गई है। 19 वर्षीय युवक के साथ हुए कथित यौन उत्पीड़न की गूंज जब जेल की ऊंची दीवारों को पार कर अदालत तक पहुंची, तब जाकर जिम्मेदारों की नींद टूटी। वरना शुरुआत में तो शिकायत को ऐसे नजरअंदाज किया गया जैसे जेल की फाइलों में अक्सर इंसानियत दबा दी जाती है। कहते हैं कि पीड़ित ने पहले जेल प्रशासन को गुहार लगाई, मगर वहां खर्राटों और औपचारिकताओं की मोटी चादर इतनी भारी थी कि उसकी आवाज दब गई। मामला जब न्यायालय पहुंचा और मेडिकल जांच के आदेश हुए, तब जिम्मेदारों ने अचानक सक्रियता का ऐसा प्रदर्शन किया मानो पूरी व्यवस्था पहले से चौकन्नी थी। ये अंदर की बात है… ( inside story) कि जांच में देरी इसलिए हुई ताकि “ऊपर तक सूचना पहुंचाने” की रस्म पूरी हो जाए और विभागीय गाज किसी की कुर्सी तक न पहुंचे। यानी पहले बचाव की पटकथा लिखी गई, फिर कार्रवाई का मंच सजाया गया। अब जेल प्रशासन जांच की मशाल लेकर घूम रहा है, लेकिन सवाल वही पुराना है, अगर पहली शिकायत पर सुनवाई हो जाती तो क्या मामला अदालत तक पहुंचता? फिलहाल जेल की सलाखों के पीछे सिर्फ आरोपी नहीं, कई जवाब भी बंद हैं।
झोलाछापों के लिए सिस्टम एनेस्थीसिया की तरह सुन्न
जिले की सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था इन दिनों ऐसी हालत में है जैसे मरीज ऑक्सीजन पर हो और डॉक्टर छुट्टी पर। आदिवासी अंचलों में झोलाछापों की दुकानें अस्पतालों से ज्यादा सक्रिय हैं। फर्क बस इतना है कि यहां इलाज कम और किस्मत ज्यादा काम करती है। पिछले दिनों कुछ मासूमों और युवाओं की मौत के बाद प्रशासन ने एफआईआर का इंजेक्शन जरूर लगाया, लेकिन बीमारी जड़ से खत्म करने का इलाज अभी भी अधूरा है। चर्चा है कि इन फर्जी क्लीनिकों का पूरा “सिंडिकेट मॉडल” चलता है, जहां हर महीने मोटी रकम देकर कारोबार को सुरक्षा कवच मिलता है। पैसा ऊपर तक पहुंचते-पहुंचते ऐसा असर करता है कि पूरा सिस्टम एनेस्थीसिया के इंजेक्शन की तरह सुन्न पड़ जाता है। इसी बीच आदिवासी क्षेत्र के एक माननीय ने अचानक झोलाछाप क्लीनिकों पर छापे मारकर स्वास्थ्य विभाग की धड़कनें तेज कर दीं। ये अंदर की बात है…( inside story) कि सात से ज्यादा एफआईआर के बाद अब छोटे अफसरों की बेचैनी बढ़ गई है। वजह साफ है, अगर यह अभियान लंबा चला तो “मासिक व्यवस्था” की दुकान बंद हो सकती है। अब देखना दिलचस्प होगा कि माननीय इस बीमारी का पूरा इलाज करते हैं या फिर सिस्टम की बंदोबस्तिया दवा खाकर मामले को बीच में छोड़कर झोलाछापों को राहत देते हैं।
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