
असीम राज पांडेय, रतलाम। पिछले दिनों जिले के जावरा शहर थाने के एक दो तारों वाले साहब ने फोरलेन पर ऐसी चेकिंग लगाई मानो अंतरराष्ट्रीय सीमा की सुरक्षा का ठेका इन्हें ही मिला हो। तपती धूप, झुलसते बच्चे, परेशान जनता, लेकिन साहब का अनुशासन प्रेम 45 डिग्री से ऊपर उबल रहा था। वाहनों से मासूमों को उतरवाया जा रहा था, पूछताछ का अंदाज ऐसा कि जैसे हर कार में कोई रहस्य छिपा हो। तभी किस्मत ने यू-टर्न लिया और सामने आ गया कलमकारों का वाहन। दस्तावेज दिखाए गए, प्रक्रिया पूरी हुई, लेकिन साहब की गरमी अभी बाकी थी, “मिस्टर, चालान बनेगा!” कारण पूछा गया तो जवाब आया, “बेल्ट नहीं लगाई।” अब कलमकारों ने भी तय किया कि खबर सिर्फ लिखी नहीं जाएगी, दिखाई भी जाएगी। कैमरा ऑन हुआ, वीडियो बना और धूप में तपते मासूमों के साथ साहब की कार्यशैली भी रिकॉर्ड हो गई। खबर बाहर आते ही गरमी का पारा गिरा और क्विक रिस्पॉंस वाहन में बैठकर चल रही थानेदारी की लाइव प्रस्तुति का मंचन अचानक समाप्त हो गया। ये अंदर की बात है… (This is an inside story!..) कि नियम समझाने निकले साहब खुद नियमों की सीट बेल्ट बांधना भूलकर क्विक रिस्पॉन्स वाहन का दुरुपयोग कर रहे थे।
कलेक्टोरेट की ‘कूल वॉर’ में आपसी खींचतान
रतलाम में कुछ महीने पहले प्रशासन के बड़े पदों पर महिला अधिकारियों की तैनाती हुई तो उम्मीदों के गुब्बारे ऐसे उड़े मानो जिला अब सुशासन का मॉडल बनने वाला हो। लेकिन जल्द ही पता चला कि यहां प्रशासनिक कसावट से ज्यादा आपसी खींचतान का योगासन चल रहा है। औद्योगिक निवेश का विरोध हो, करनी सेना का आंदोलन हो, जनप्रतिनिधियों के धरने हों या अधीनस्थों की मनमर्जी। हर मोर्चे पर प्रशासन ऐसा दिखा जैसे परीक्षा में प्रश्नपत्र देखकर छात्र। सत्ता पक्ष के जनप्रतिनिधि नाराज, अधिकारी-कर्मचारी परेशान और विधायक निधि के काम फाइलों में ध्यान मुद्रा लगाए बैठे हैं। सुना है निर्माण कार्यों की फाइलें दो-दो, चार-चार महीने से लंबित हैं। राजस्व मामलों में जिले की रैंकिंग ऐसी है कि भोपाल से बार-बार “तेजी लाओ” की घंटी बजती है, मगर यहां कानों में सरकारी ईयरप्लग लगे हैं। ताजा चर्चित अध्याय एक वरिष्ठ महिला अधिकारी और नेतृत्वकर्ता के बीच बंद कमरे में हुई गरमागरम बहस। आवाजें इतनी प्रभावी थीं कि कलेक्टोरेट की दीवारों ने भी नोटशीट बना ली। ये अंदर की बात है… (This is an inside story!..) कि जिले में फिलहाल प्रशासन जनता से कम और अपने-अपने स्वार्थ की खींचतान में ज्यादा जूझता नजर आ रहा है।

मंडी में फसल से ज्यादा नियमों की बिक्री के ढेर
जिले की मुख्य उपज मंडी में इन दिनों काम कम और “मंडी इंस्पेक्टर हूं” वाला परिचय ज्यादा चमक रहा है। किसान 45 डिग्री तापमान में अपनी मेहनत की फसल लेकर आता है, लेकिन उसे सुविधा के नाम पर वही मिलता है जो सरकारी वादों में मिलता है, जैसे कि उम्मीद। पानी के लिए किसान तरसता है, छांव ढूंढता है और व्यवस्था उसे मधुमक्खी के छत्ते जैसी उलझनें परोस देती है। उधर नीलामी का दृश्य भी कम रोचक नहीं। मंडी के छज्जे में फसल की बोली लगेगी, इशारे होंगे, आंखें बोलेंगी और फिर किसान को आदेश मिलेगा “माल बाहर के गोदाम में ले जाओ।” कहते हैं नियम किताबों में रहते हैं और खेल मैदान में। यहां भी कुछ ऐसा ही है। बाहर तुलाई, टैक्स की बचत और आर्थिक रिश्तों की मजबूती का ऐसा त्रिकोण बनता है कि गणितज्ञ भी हैरान हो जाएं। हाथछाप ने पुतला फूंका, किसानों की समस्या उठाई, लेकिन जिम्मेदार जानते हैं कि राजनीति की अपनी पटकथा होती है। ये अंदर की बात है… (This is an inside story!..) कि मंडी में किसान की फसल से ज्यादा तेज़ी से अगर कुछ बिक रहा है, तो वह है सिर्फ नियमों की किताब।
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