
असीम राज पांडेय, रतलाम। रतलाम की एक शादी में बजते डीजे की धुन अचानक मातम में बदल गई, और दो जिंदगियों के साथ चार बचपन भी अनाथ हो गए। शहर में चर्चा है कि आजकल जेब में चाकू और नशे की पुड़िया रखना कुछ युवाओं का “स्टाइल स्टेट्स” बन चुका है।क्योंकि डर नाम की चीज़ बची नहीं है। घटना के बाद कप्तान साहब सड़कों पर उतरे, सख्ती भी दिखाई, कुछ आवारा तत्व पकड़े गए। पर सवाल वहीं का वहीं है, क्या पुलिस की सक्रियता सिर्फ हादसों के बाद ही जागती है? बीट और माइक्रो बीट की जिम्मेदारी निभाने वाले मानो अदृश्य हो गए हैं, जबकि रोजनामचे में गश्त की हाजरी पूरी ईमानदारी से दर्ज हो रही है। शहर के लोग तंज कसते हैं कि शायद गश्त अब सड़कों पर नहीं, बल्कि एसी कमरों में बैठकर मानसिक रूप से की जा रही है। ये अंदर की बात है… (This is an inside story!..) कि खाकी की मुस्तैदी के दावे जितने ऊँचे हैं, जमीन पर उनका असर उतना ही हल्का दिखता है। और इसकी कीमत कभी-कभी किसी के पूरे परिवार को चुकानी पड़ती है।

पदभार समारोह बना “पूर्व माननीय” का श्रेय मंच
रतलाम विकास की कुर्सी पर नए अध्यक्ष की ताजपोशी हुई, पर असली मुकाबला कुर्सी का नहीं, श्रेय का था। समारोह में पूर्व माननीय की एंट्री किसी फिल्मी सीन से कम नहीं रही। पहले नीचे बैठकर माहौल तौला, फिर मान-मनुहार के बाद मंच पर विराजे। और जैसे ही माइक हाथ में आया, शब्दों की ऐसी बारिश शुरू हुई कि सुनने वालों को लगा मानो यह पूरी नियुक्ति उन्हीं की देन हो। नए अध्यक्ष की तारीफों के पुल बांधते-बांधते उन्होंने यह जताने की कोशिश भी कर दी कि “ये तो मेरे ही शिष्य हैं।” लेकिन शहर माननीय भी कम नहीं निकले। उन्होंने रिश्तों, कार्यों और योगदान की ऐसी बारीक कहानी सुनाई कि पूर्व माननीय के श्रेय लेने का गुब्बारा धीरे-धीरे पिचकने लगा। फूलछाप गलियारों में चर्चा गर्म है कि राजनीति में काम से ज्यादा क्रेडिट का खेल चलता है। ये अंदर की बात है… (This is an inside story!..) कि पूर्व माननीय का यह हुनर नया नहीं है। शुरुआत से ही श्रेय लेने की कला में माहिर रहे हैं, शायद यही वजह है कि आज वे अपनी ही पार्टी के हर छोटे से लेकर बड़े फैसले से दूर नजर आते हैं।

“भारत सरकार” की गाड़ी से एक्सीडेंट की कहानी
रतलाम की सड़कों पर दौड़ती एक काली कार, जिस पर “भारत सरकार” लिखा था, अचानक एक हादसे के बाद सवालों के कटघरे में आ गई। यह कार किसी आम नागरिक की नहीं, बल्कि रेलवे के एक वरिष्ठ अधिकारी के बंगले की शान बढ़ा रही थी।भले ही इसकी वैधता तीन साल पहले ही खत्म हो चुकी थी और बीमा तो मानो इतिहास की बात हो। हादसे में एक वरिष्ठ वकील की जान चली गई, और कहानी यहीं से दिलचस्प हो जाती है। बताया जाता है कि उस समय गाड़ी अधिकृत ड्राइवर नहीं, कोई और चला रहा था। लेकिन कार्रवाई क्या हुई? कार जब्त, और एक साधारण ड्राइवर पर केस दर्ज। वकीलों का गुस्सा उबाल पर है, और सवाल सीधा है – क्या जिम्मेदारी भी सिस्टम की कार्यप्रणाली की तरह सो जाती है? ये अंदर की बात है… (This is an inside story!..) कि अफसरों के आपसी रिश्तों की मजबूती अक्सर कानून की धार को थोड़ा कुंद कर देती है। अब देखना यह है कि न्याय के मंदिर में इस केस की फाइल कितनी तेजी से चलती है और सच्चाई कैसे सामने आती है।
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