
असीम राज पांडेय, रतलाम। पटरी पार की चर्चित प्रोफेसर कॉलोनी इन दिनों फिर सुर्खियों में है। मामला सार्वजनिक रास्ते, बाउंड्रीवॉल और सरकारी खर्च की ऐसी तिकड़ी का है जिसने चौपाल से लेकर दफ्तरों तक चर्चा गर्म कर रखी है। बताया जाता है कि वर्षों पहले नियमों को किनारे रखकर जो हरियाली उगाई गई थी, उस पर अदालत ने अपनी कैंची चला दी और साफ कहा कि रास्ता रास्ता ही रहेगा, बगीचे की निजी जागीर नहीं बनेगा। मजेदार बात तब हुई जब अदालत में निगम की ओर से झूठी खबर पहुंच गई कि रास्ता खुल चुका है। मगर क्षेत्र के लोगों ने देखा तो दीवारें अब भी सीना ताने खड़ी थीं। फिर क्या था, जनता ने खुद ही रास्ते की रुकावट हटाकर आवागमन आसान कर दिया। बस यहीं से निगम की ओर से पैरवी कम दलाली में सक्रिय एक काले कोट वाले महाशय का तापमान बढ़ गया। वे ऐसे सक्रिय हुए मानो पूरे प्रशासन की रिमोट कंट्रोल उन्हीं के हाथ में हो। थाने से लेकर दफ्तरों तक परिचय भी दिलचस्प रहा। कभी संगठन का रुतबा, कभी संपर्कों का वजन और कभी कोर्ट में पैरवी के विपरीत एक नई झूठी कहानी। ये अंदर की बात है…(This is an inside story!) कि जिम्मेदार अफसर भी काले कोट के महाशय के इस अभिनय से परिचित थे। चौराहों पर अब चर्चा यह है कि रास्ते का सीमांकन के साथ रास्ता तो खुल चुका, लेकिन काले कोट के साथ वार्ड के फूलछाप नेताओं की दिलचस्प झूठी लड़ाई से अब आम से लेकर खास सब वाकिफ भी हो चुके हैं।
फोरलेन के ढाबों पर दाल कम, डोडा ज्यादा!
जावरा क्षेत्र के कुछ ढाबे इन दिनों अपने खाने से कम और चर्चाओं से ज्यादा मशहूर हैं। बाहर बड़े-बड़े बोर्ड स्वादिष्ट भोजन, शुद्ध शाकाहार और पारिवारिक वातावरण का दावा करते हैं, लेकिन राहगीरों को अक्सर वहां ग्राहकों से ज्यादा सन्नाटा नजर आता है। यही सन्नाटा लोगों की जिज्ञासा बढ़ा रहा है। चर्चा है कि कुछ ढाबों ने रोटी-सब्जी के पारंपरिक कारोबार को पीछे छोड़कर दूसरे तरह की “सप्लाई चेन” विकसित कर ली है। की-पैड मोबाइल पर ऑर्डर, खेतों से खरीद और फिर लंबी दूरी की डिलीवरी। यह व्यवस्था किसी आधुनिक लॉजिस्टिक्स कंपनी जैसी बताई जा रही है। फर्क सिर्फ इतना है कि यहां मेन्यू कार्ड सार्वजनिक नहीं होता। स्थानीय लोगों का कहना है कि खाकी की नियमित जांच, कर्मचारियों का सत्यापन और निगरानी जैसी व्यवस्थाएं अक्सर ढाबों तक पहुंचने से पहले ही कहीं रास्ता भटक जाती हैं। ये अंदर की बात है…(This is an inside story!) कि फोरलेन किनारे खड़े कुछ ढाबों को देखकर अब लोग पूछने लगे हैं, यहां थाली मिलेगी या “थोक सप्लाई” का कोई दूसरा पैकेज? और जब चर्चा कमाई की हो, तो फिर जांच करने वालों की संख्या भी अपने-आप कम हो जाती है।
जीप वाली टीम का स्पॉट डील का नया गणित
शहर को अतिक्रमण मुक्त बनाने के लिए बनाई गई स्पॉट फाइन टीम इन दिनों अपने अनोखे कार्यशैली के कारण चर्चा में है। सरकारी ईंधन से चलने वाली काली जीप जब बाजार में प्रवेश करती है तो कुछ फुटपाथ विक्रेताओं की धड़कनें अपने-आप तेज हो जाती हैं। टीम में शामिल एक बॉडी बिल्डर साहब की कार्यप्रणाली विशेष आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। बताया जाता है कि वे पहले फिल्मी अंदाज में कार्रवाई का ट्रेलर दिखाते हैं, फिर समाधान का निजी पैकेज पेश करते हैं। हाल ही में एक ठेला संचालक के साथ ऐसा ही दृश्य देखने को मिला। पहले सख्त चेतावनी, फिर अगले दिन मोबाइल पर “मदद” का प्रस्ताव और साथ में दो हजार रुपये का गणित। दिलचस्प यह है कि शहर में अतिक्रमण की लंबी फेहरिस्त होने के बावजूद कार्रवाई का निशाना अक्सर वही बनता है जिसकी जेब सबसे कमजोर हो। उधर बड़े-बड़े कब्जे अपनी जगह पर उतने ही आत्मविश्वास से खड़े हैं जितना किसी उद्घाटन समारोह का मुख्य अतिथि। ये अंदर की बात है… (This is an inside story!) कि स्पॉट फाइन की अवधारणा राजस्व बढ़ाने के लिए बनी थी, लेकिन कुछ लोगों ने इसे “स्पॉट समझौता योजना” में बदलने की कोशिश कर दी। अब देखना यह है कि जीप की रफ्तार पहले रुकती है या चर्चाओं का सिलसिला।
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